Wednesday, June 23, 2021
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मृगदाव में बुद्ध से ‘मिले’ थे अशोक

कलिंग युद्ध को समाप्त हुए 4 वर्ष बीत चुके थे। इस युद्ध में हुए रक्तपात से सम्राट अशोक का मन विचलित हो उठा था। रणभूमि में मारे गए एक लाख से अधिक सैनिकों के शव मगध नरेश से बार-बार सवाल कर रहे थे। चंड अशोक! इस जीत को कहां रखोगे। अशोक का मन बार-बार सवालों के उत्तर तलाश रहा था। 
कुछ दिन बाद अशोक ने देखा कि दो पुरुष मुंडे सर, लंबा चोगा पहने भिक्षाटन कर रहे हैं। उन भिक्षुओं ने कहा, हे सम्राट! तुम्हारे मन की तपिश को शांत करने का मार्ग है- ‘बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि’ अथार्त बुद्ध की शरण में जाओ, धम्म की शरण में जाओ। लेकिन बुद्ध की शरण में कैसे जाया जा सकता है। ऐसा करना तो कठिन है, अशोक शरण में कैसे जाएंगे, वे तो महानायक हैं। वे शरणागत कैसे हुए होंगे…। वे तो बस उन भिक्षुओं (निग्रोध और मौग्गलिपुत्ततिस्स, जिनका उल्लेख सिंहली जनश्रुतियों दीवंश और महावंश में मिलता है) के पीछे-पीछे चले होंगे।

कहा जाता है कि मानसिक रूप से परेशान अशोक भिक्षुओं की बातों से मंत्रमुग्ध हो गये और उन भिक्षुओं के पीछे-पीछे चले। अशोक देखते हैं बोधि वृक्ष के नीचे एक ज्योति पुंज में लिपटा, घुंघराले बालों वाला कंचन काया पुरुष ध्यान की मुद्रा में बैठा है। उसकी आंखें अधखुली हैं। तभी एक आवाज गूंजती है-अशोक! एक दिव्य आवाज से इस संबोधन को सुन एकबारगी अशोक थम से गये। इसके बाद सम्राट के मन में उठ रही सारी तपन शांत हो गई। अब अशोक बुद्ध की शरण में आ चुके थे। धम्म की शरण में आ चुके थे। यानी चंड अशोक, कलिंग विजेता सम्राट अशोक, बुद्ध के शरणागत हो चुके थे। इतिहास के पन्ने कहते हैं, अशोक और बुद्ध का काल समान नहीं था। बुद्ध तो बिंबसार के काल के हैं। भले ही बुद्ध और अशोक में पीढि़यों का अंतर रहा हो, लेकिन बुद्ध को आत्मसात किया अशोक ने।

तथागत बुद्ध के निर्वाण के बाद उनकी अस्थियों पर अधिकार को लेकर 16 महाजनपदों के राजाओं में युद्ध की स्थिति पैदा हो गयी थी। आनंद की सूझबूझ से यह टकराव टला और 18 स्थानों पर बुद्ध के अस्थिकलश पर स्तूप बने, लेकिन 18 स्तूपों से 84 हजार स्तूप निर्मित करवा कर उनमें तथागत की अस्थियों को विराजमान करने का श्रेय अशोक को जाता है। अशोकावदान के अनुसार बौद्ध भिक्षु उपगुप्त से दीक्षित अशोक अहिंसा के पुजारी हो चुके थे। वह मगध से चल कर मृगदाव (सारनाथ) आते हैं। यह वही सारनाथ या मृगदाव है, जहां ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने अपना पहला धर्मोपदेश उन पांच साथियों को दिया, जो उनके साथ तपस्या करते थे। अशोक ने न केवल यहां धर्मराजिका स्तूप का निर्माण करवाया, बल्कि कई बौद्ध विहारों का भी निर्माण करवाया। सारनाथ वही स्थल है, अशोक ने सिंह शीर्ष स्तंभ स्थापित कर बौद्ध धर्म को चिरस्थायी रूप दिया। सारनाथ आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि अशोक के समय या उसके बाद के राजवंशों के समय में हुआ करता था।

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