Wednesday, June 23, 2021
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भगवद् गीता स्वतंत्र इच्छा का सिद्धांत:श्रीकृष्ण

भगवद् गीता का मार्ग बाध्यता का मार्ग नहीं है, बल्कि यह तो स्वतंत्र इच्छा का मार्ग है। यह आत्म-साक्षात्कार की वह राह है जिसमें संबधित व्यक्ति की राय को नकारा नहीं जाता, बल्कि उसके ईमानदार और सुविचारित मत को पूरा सम्मान दिया जाता है। परमात्मा ने मानव को अपने फैसले स्वयं लेने की स्वतंत्रता दी है। लेकिन स्वतंत्रता असीमित नहीं हो सकती। मनुष्य को उस स्वतंत्रता का उपयोग जीवन के परम उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पूरी सावधानी के साथ करना चाहिए।

जीवन के दर्शन को पूरी तरह से समझाने और भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने के बाद भगवान श्री कृष्ण ने अंत में अर्जुन से कहा– ‘इस प्रकार मैंने सभी रहस्यों से भी अधिक रहस्यमयी और गोपनीय यह ज्ञान तुम्हें बतला दिया है। इस पर पूरी तरह से विचार करने के पश्चात जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा तुम करो।’ अर्जुन के साथ संवाद के दौरान श्रीकृष्ण ने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए हर एक वस्तु के फायदे और नुकसान समझाये। सब कुछ विस्तार में बताने के बाद श्री कृष्ण ने अर्जुन से इस बारे में गंभीरता से सोचने और फिर जैसा उसे ठीक लगे वैसा करने को कहा। श्री कृष्ण ने अर्जुन पर ही फैसला छोड़ दिया। परमात्मा ने मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा प्रदान की है ताकि परिस्थितियों को देखते हुए वह उपयुक्त विकल्प चुन सके। परन्तु मनुष्य को अपने फैसले किसी आवेग में आकर नहीं लेने चाहिए। निर्णय सुविचारित होना चाहिए। यही कारण है कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अपनी शिक्षाओं का पालन बिना सोचे समझे करने को नहीं कहा।

भगवान केवल पथ दिखा सकते हैं, मनुष्य का मार्गदर्शन कर सकते हैं, जब कभी वह लड़खड़ाता है तो उसको सहारा दे सकते हैं। लेकिन ईश्वर न तो मनुष्य को कोई कार्य करने के लिए बाध्य करते हैं और न ही वह कभी अपनी ओर से कार्य करते हैं। इस प्रकार भगवद्गीता न केवल व्यक्ति के अपने निर्णय स्वयं लेने के अधिकार पर जोर देती है, बल्कि यह भी बताती है कि उस अधिकार का इस्तेमाल कैसे किया जाये। अपने फैसलों को आवेग और जुनून से नहीं बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान से निर्देशित किया जाना चाहिए। यदि हम अपने स्वार्थों से ऊपर नहीं उठ पाते और हमारा आचरण बुद्धि द्वारा निर्देशित नहीं होता तो हम वासना, जोकि मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है, के शिकार बन सकते हैं।

आत्मा के रूप में मनुष्य एक ऐसा विषय है जो जीवन का अनुभव करता है, और मन एवं शरीर उसके अनुभव की वस्तुएं हैं। परमात्मा चाहता है कि आत्मा मन और शरीर पर नियंत्रण प्राप्त करे। वह चाहता है कि सभी को पूर्णता प्राप्त हो। साथ ही परमात्मा यह भी चाहता है कि मनुष्य उसे प्राप्त करने का प्रयास किसी भय या मजबूरी से नहीं बल्कि अपनी इच्छा से करे। मनुष्य को परमात्मा के साथ एक होना चाहिए और उस एकता को प्राप्त करने के लिए सदा प्रयास करते रहना चाहिए।

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