Saturday, October 31, 2020
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जय जय हे महिषासुर मर्दिनी…

संपूर्ण विश्व शक्तिमय है, इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता। देखा जाये तो सृजन, पालन और विसर्जन, ये तीनों तत्व ही मिलकर हमें सृष्टि की संपूर्णता का बोध कराते हैं। प्राचीन भारतीय संस्कृति में सृजन के लिए ब्रह्मा, पालन के लिए विष्णु और संहार के जिए महेश यानी शिव को देव माना गया है। ब्रह्मा के साथ ही मां महासरस्वती, विष्णु के साथ महालक्ष्मी और शिव के साथ महाकाली जुड़ी हुई हैं। मूल रूप से इन सभी शक्तियों का स्वरूप एक ही है, वह है शक्ति और शौर्य की प्रतीक मां दुर्गा।

ऋग्वेद के देवी व रात्रि सूक्त में, सामवेद के रात्रि सूक्त में और वैदिक काल में शक्ति चेतन की सत्ता की स्थापना का विशद विवेचन किया गया है। ऋग्वेद में भुवनेश्वरी देवी को कई नामों से संबोधित किया गया है। जैसे- विश्व दुर्गा, सिंधु दुर्गा, अग्नि दुर्गा आदि। मातृका देवी को अंबिका भी कहा जाता था। मत्स्य पुराण में दुर्गा को दस भुजाओं वाली, जबकि अग्नि पुराण में बीस भुजाओं वाली देवी का वर्णन मिलता है। कुषाण काल के आते-आते दुर्गा का सिंह पर सवार देवी स्वरूप प्रतिष्ठित हो चुका था। उस समय उनकी कांस्य प्रतिमाएं भी निर्मित होने लगीं थीं। दुर्गा के उग्र और शांत दोनों स्वरूप देखने को मिलते हैं। शांत स्वरूप में दुर्गा के उमा, उषा, गौरी, अम्बिका और उग्र रौद्र रूप में महाकाली, चंडिका, महादुर्गा और महिषासुर मर्दिनी आदि नामों का वर्णन मिलता है।

मां दुर्गा की उत्पत्ति के संदर्भ में शिव पुराण के अनुसार आदि देव शिव ने लीला शक्ति से अपने आकार यानी मूर्ति की कल्पना की, उसके पश्चात उन्होंने अपने ही विग्रह से एक स्वरूप मूर्त शक्ति की रचना की, जो परा शक्ति की प्रधान, प्रकृति, माया, बुद्धि तत्व की जननी तथा विकार रहित थी। शिव की यही शक्ति अंबिका कहलायी जिसे पार्वती, शिवा, उमा, शैल, तनुजा, शक्ति आदि नामों से पुकारा गया।

मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य के अध्याय-2 के अनुसार महिषासुर वध के लिए देवी प्रकट हुईं। सबसे पहले भगवान विष्णु के मुखमंडल से एक प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा एवं शिव आदि देवताओं के शरीर से एक तीव्र तेज निकला, जो मिलकर एकाकार हो गया। उसके पश्चात वह एकाकार रूप एक नारी रूप में परिवर्तित हो गया। उस नारी स्वरूप को शिव के तेज से मुख, यमराज के तेज से बाल, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से वक्ष, इंद्र के तेज से कटि प्रदेश, वरुण के तेज से जंघाएं, पृथ्वी के तेज से नितम्ब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से उंगलियां, कुबेर के तेज से नासिका, प्रजापति के तेज से दांत, अग्नि के तेज से तीनों नेत्र और वायु के तेज से कान उत्पन्न हुए। दुर्गा सप्तशती के अनुसार इस नारी स्वरूपा दुर्गा को असुरों के साथ होने वाले महासंग्राम में विजयश्री प्राप्ति हेतु भगवान शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, वरुण देव ने शंख, पवन देव ने धनुष बाण और तरकश, देवराज इंद्र ने वज्र और अपने वाहन ऐरावत हाथी के गले से उतारकर घंटा, यमराज ने काल दण्ड और तलवार व ढाल, विश्वकर्मा ने फरसा और अग्निदेव ने शक्ति बल मिलाकर अजेय हथियार प्रदान किये। पर्वतराज हिमालय ने वाहन के रूप में सिंह भेंट किया। प्रजापति दक्ष ने स्फटिक की माला, ब्रह्मा ने कमंडल, समुद्रदेव ने हार, वस्त्र, चूड़ामणि, कुंडल, कड़े, रत्नजड़ित अंगूठियां भेंट की। इसके उपरांत देवताओं से शक्ति प्राप्त कर देवी ने संग्राम में असुरों का भीषण संहार किया और महिषासुर वध के बाद देवी महादुर्गा महिषासुर मर्दिनी कहलायीं। वस्तुत: यह आदि देव शिव की ही शक्ति हैं जो सिंह वाहिनी के रूप में अनेक रूप धारण किये हुए हैं। यह अपने तीनों गुणों सात्विक, राजसिक और तामसिक के आधार पर महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के रूप में विख्यात हैं। शक्ति का पूर्ण विकसित रूप शाक्त पुराणों में मिलता है। इनमें मुख्यतः देवी का चित्रण युद्धरत यानी रक्षा करने वाली देवी के रूप में हुआ है।

शक्ति की उपासना भारतीय संस्कृति का मूल है। भारत ही नहीं, विश्व के अनेक देशों में भी देवी के रूप में शक्ति पूजन की परंपरा प्रचलित रही है। मिस्र में आइसिंस हेयर, यूनान में दीमितोर, तिब्बत में लो भी और जापान में चनेष्टि नाम से शक्ति की प्रतीक देवी की पूजा की जाती है। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि प्राचीन सभ्यताओं के प्राप्त अवशेषों में लिंग, योनि, नंदी आदि की प्राप्ति यह सिद्ध करती है कि अत्यंत प्राचीन काल में भी शक्ति पूजा की परंपरा अस्तित्व में थी। प्राचीन काल में संपूर्ण विश्व में मातृ सत्तात्मक परिवारों की परंपरा थी, ऐसी स्थिति में सृष्टि का संचालन करने वाली अदृश्य शक्ति का स्त्री रूप में धारण किया जाना स्वाभाविक था। मातृदेवी की प्रतिष्ठा ग्रीस, यूरोप, मध्य एशिया, जापान आदि देशों में थी। बेबीलोन में नीर्थो, स्काॅटलैंड में फेईललिक शक्ति के रूप में पूजी जाती थीं। भारत में पटना और तक्षशिला आदि स्थानों पर की गई पुरातात्विक खोजों में भी इस तथ्य और मान्यता की पुष्टि होती है।

चैत्र और शरद माह के नवरात्र, दुर्गा मां के शक्ति स्वरूप के आराधना पर्व हैं। यथार्थ में यह पूजा आसुरी प्रवृत्ति पर विजय के उपलक्ष्य में होती है। शारदीय नवरात्रि की महिमा सर्वोपरि है। ‘शरदकाले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी’। दुर्गा सप्तशती के अनुसार शारदीय नवरात्र की दुर्गापूजा वार्षिक पूजा होने के कारण महापूजा कहलाती है। शाक्त तंत्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि मानव जीवन समस्या एवं संकटों की सत्यकथा है। अतः सांसारिक कष्टों के दलदल में फंसे मनुष्यों को दुर्गा की उपासना करनी चाहिए। वह आद्याशक्ति ‘एकमेव’ होते हुए भी अपने भक्तों को- काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्तिका, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी एवं कमला- इन दस महाविद्याओं के रूप में वरदायिनी होती है। वही जगन्माता अपने भक्तों के दुख दूर करने के लिए- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्मांडा, स्कन्धमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री- इन नवदुर्गाओं के रूप में अवतरित होती हैं।

दुर्गा शक्ति की अधिष्ठात्री हैं। दुर्गा का अर्थ है राक्षसों का विनाश करने वाली अर्थात बुराई को मिटाने वाली शक्ति। दुर्गा के विभिन्न रूप हैं और इनके लिए 108 नामों का उल्लेख है। इनमें कात्यायनी, चंडिका, अम्बा, गौरी, कपालिनी, चामुण्डा, काली, उमा, भवानी, छिन्नमस्तिका, सुन्दरी और कमला आदि प्रमुख हैं। दुर्गा के इन चरित्रों का मनन करने के बाद हमें यही शिक्षा मिलती है कि सोई हुई शक्ति को बिना जागृत किए किसी भी महत्वपूर्ण काम में सफलता प्राप्ति असंभव है। हमेशा सक्रिय नहीं रहने से हमारी इंद्रियां मलिन होकर ‘मधु कैटभ’ जैसी आत्मघाती पाशविक शक्तियों को जन्म देती हैं, जिनका संहार भगवती महादेवी द्वारा प्रदत्त बुद्धि शक्ति के बिना असंभव है।

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