Wednesday, October 21, 2020
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…क्योंकि उत्सव हैं बेटियां

अक्तूबर का महीना आधा बीत चुका है। हवा में अब हल्की सी ठंड बढ़ चली है। सर्दी का आगमन बस होने को है। सवेरे की पहली किरण- घर, आंगन, चौखट, दरवाजों, फूलों, पत्तियों, बगीचों, खिड़कियों पर अब कुछ देर से दस्तक देती है, लेकिन जब तक सर्दी आए तब तक शरद ऋतु में आने वाली नवरात्रि को धूमधाम से मना लिया जाए। हालांकि इस बार दुर्गा पूजा पितृपक्ष के एक माह बाद शुरू हो रही है।

अकसर पितृपक्ष के फौरन बाद नवरात्रि शुरू हो जाती हैं। अपने पूर्वजों की याद, उनके जाने के शोक के बाद उत्सव का माहौल भी जरूरी है। अगर जीवन भर शोक रहे तो जीवन कैसे चले। पितृपक्ष में तो हर तरह की खरीदारी से दूर रहे थे, इसीलिए नवरात्रि के आने पर बाजार सज जाते हैं। तरह-तरह के समान से भर जाते हैं। बहुत से समानों और उत्पादों पर भारी छूट के विज्ञापन भी दिखाई देते हैं। जगह-जगह पंडाल लगाकर दुर्गा प्रतिमाएं सजाई जाती हैं। कारीगर रात-दिन इन्हें बनाते हैं तभी ये इन पंडालों में सज पाती हैं। मंदिरों में तो देवी का उत्सव होता ही है। इस लेखिका ने कोलकाता में चलने वाला उत्सव भी देखा है। वहां की भीड़ भरी सड़कों को देखकर लगता है कि जैसे पूरा शहर सड़कों पर उमड़ आया हो। किसी होटल या दुकान में आसानी से जगह नहीं मिलती। वहां इसे धार्मिक के अलावा सांस्कृतिक उत्सव भी माना जाता है। इसलिए प्रायः धार्मिक दीवारें भी टूट जाती हैं। कोलकाता के लोग बहुत गर्व से बताते हैं कि इस उत्सव में समाज के हर धर्म और वर्ग के लोग उत्साह से भाग लेते हैं। जगह-जगह , पूजा पंडाल सजे होते हैं। एक बार बांग्लाभाषी एक ईसाई सहेली को इस उत्सव में भाग लेते देखा था। वह सिंदूर और बिंदी भी लगाती थीं। उसने यही कहा था कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान है। विरासत है। हालांकि पिछले दिनों जब तृणमूल की एक मुसलमान महिला सांसद ने दुर्गा का रूप धरा, तो उन्हें भारी आलोचना अपने ही धर्म के लोगों की झेलनी पड़ी। धर्म की ये दीवारें टूटना हर समाज के लिए अच्छा है, मगर बहुत से निहित स्वार्थ ऐसा नहीं चाहते।

इस बार कोरोना के कारण लोगों ने एक-दूसरे से दूरी का पाठ पढ़ा है। कहीं भीड़-भाड़ ज्यादा न हो इसके लिए लोगों को लगातार प्रेरित किया जा रहा है। इसलिए थोड़ी शंका-आशंका के बीच तैयारियां चलीं।

अपने देश में दुर्गा पूजा का मतलब स्त्री की पूजा भी है। बेटी की अहमियत का गान भी है। घर-घर में लड़कियों का स्वागत है। उनके पांवों को पखारना है। उनकी पसंद का भोजन उन्हें खिलाना है। पूरी, पकवान तरह-तरह की मिठाइयों से घर-घर महकता है। सुस्वादु भोजन के अलावा यह माता स्वरूप लड़कियों को दान-दक्षिणा का अवसर भी है। सब चाहते हैं कि उनके घर में सबसे पहले लड़कियां आएं, जिससे कि सबसे पहले उनके घर में पेट भर भोजन कर सकें। सप्तमी, अष्टमी, नवमी को बच्चियों को इतने घरों से बुलावा आता है, इतनी जगह भोजन परोसा जाता है कि कितना खाएं, कैसे खाएं। इसलिए भोजन उन्हें पैक करके भी दे दिया जाता है। एक बार एक बच्ची की मां ने हंसते हुए कहा था कि इन दिनों उनके घर में इतना खाना आता है कि उसे फ्रिज में रख दिया जाता है। पूरा परिवार कई दिन तक इसका आनंद लेता है।

लड़कियों की इस तरह से पूजा, दुर्गा पूजा के रूप में स्त्री की वीरता का गान, शायद ही किसी दूसरे देश में दिखता हो। हो सकता है कि पूर्वजों की इसे इस तरह से मनाने की यही मंशा रही हो कि वे स्त्रियां जो इस सृष्टि को चलाने वाली हैं, घर-परिवार की धुरी हैं, जिनके बिना घर, घर नहीं माना जाता आखिर उनके सम्मान, उनके महत्व के लिए भी कोई अवसर जरूर होना चाहिए। ऐसा अवसर, जहां पुरुष भी स्त्रियों के पांव छूते, उनसे आशीर्वाद लेते देखे जाएं। वैसे भी समाज तभी तो चल सकता है, जब हम उसमें हर एक की पहचान करें, उसके महत्व को पहचानें। आखिर स्त्री से ज्यादा महत्वपूर्ण इस समाज , इस दुनिया को चलाने वाला दूसरा और कौन है। स्त्री शक्ति की पूजा इसीलिए जरूरी है।

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