Tuesday, October 20, 2020
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अंतहीन आकांक्षा

अमेरिका के अरबपति उद्योगपति कार्नेगी ने मरने से पहले अपने सेक्रेटरी से पूछा, ‘ईश्वर को साक्षी मानकर सच बताओ कि अगर अंत समय परमात्मा तुझसे पूछे कि तू कार्नेगी बनना चाहेगा या सेक्रेटरी, तो तू क्या जवाब देगा?’ सेक्रेटरी ने उत्तर दिया, ‘सर! मैं तो सेक्रेटरी ही बनना चाहूंगा। आपको 40 साल से देख रहा हूं। आप दफ्तर में सबसे पहले आ धमकते हैं और सबके बाद जाते हैं। आपने जितना धन इकट्ठा कर लिया, उससे अधिक के लिए निरंतर चिंतित रहते हैं। आप ठीक से खा नहीं सकते, रात को सो नहीं सकते। मैं तो स्वयं आपसे पूछने वाला था कि आप दौड़े बहुत, लेकिन पहुंचे कहां? यह क्या कोई सार्थक जिंदगी है? यह सुनकर कार्नेगी ने अपने सेक्रेटरी से कहा, ‘तुम सही कहते हो। मैं धनपति कुबेर हूं लेकिन काम से फुर्सत ही नहीं मिली, बच्चों को समय नहीं दे पाया, पत्नी से अपरिचित ही रह गया, मित्रों को दूर रखा, बस अपने साम्राज्य को बचाने-बढ़ाने की निरंतर चिंता। यह दौड़ व्यर्थ की थी। कल ही मुझसे किसी ने पूछा था-क्या तुम तृप्त होकर मर पाओगे? मैंने उत्तर दिया-मैं मात्र दस अरब डॉलर छोड़कर मर रहा हूं। सौ खरब की आकांक्षा थी, जो अधूरी रह गई।’

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