Tuesday, October 20, 2020
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जब शिव से बकरी के लिए मांगा गया वर

काशीपुरी की उत्तर दिशा में उत्तरार्क कुंड है, जहां भगवान सूर्य उत्तरार्ध नाम से निवास करते हैं। वहीं प्रियव्रत नाम से एक ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी अत्यंत सुंदरी और पतिव्रता थी। उन दोनों से एक कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम सुलक्षणा था। वह बड़ी रूपवती, विनीत, सदाचारिणी और माता-पिता की अति प्रियकारिणी थी। वह बड़ी हुई तो उसके पिता को चिंता हुई कि इसके लिए योग्य उत्तम वर कहां से मिलेगा! इस चिंता से ग्रस्त होकर प्रियव्रत अंत में मृत्यु को प्राप्त हो गये। प्रियव्रत की पत्नी भी नहीं रहीं। अब माता-पिता के मरने पर सुलक्षणा दुख से व्याकुल हो उठी। वह अनाथ सोचने लगी कि मैं असहाय इस संसार को कैसे पार करूंगी? मेरे माता-पिता ने मुझे किसी वर को अर्पण नहीं किया, ऐसी दशा में स्वेच्छा से मैं किसे वरण करूं? यदि मैंने किसी का वरण किया भी और वह अनुकूल न हुआ तो क्या होगा? उसके पास कई युवक इस इच्छा से आये, पर उसने किसी को वरण नहीं किया। वह सोचने लगी, जिन्होंने मुझे जन्म दिया, बड़े लाड़-प्यार से पाला, वे मेरे माता-पिता कहां चले गये? इस जीवन की अनित्यता को धिक्कार है। जैसे माता-पिता का शरीर चला गया, निश्चय ही उसी प्रकार मेरा यह शरीर भी चला ही जाएगा।’

ऐसा विचार कर सुलक्षणा ने उत्तरार्क के पास घोर तपस्या शुरू कर दी। उसकी तपस्या के समय प्रतिदिन एक छोटी-सी बकरी उसके आगे आकर अविचल भाव से खड़ी हो जाती। फिर शाम को वह कुछ घास, पत्ते खाकर उत्तरार्क कुंड का जल पीकर अपने स्वामी के घर चली जाती। तदन्तर एक दिन भगवान शंकर पराम्बा भगवती पार्वती के साथ लीलापूर्वक विचरते हुए वहां आये। सुलक्षणा वहां ठूंठ की भांति खड़ी थी। वह तपस्या से अत्यंत दुर्बल हो रही थी। दयामयी भगवती ने भगवान शंकर से निवेदन किया, भगवन! यह सुंदरी कन्या बंधु-बांधवों से हीन है, इसे वर देकर अनुगृहीत कीजिये। दयासागर भगवान ने इस पर सुलक्षणा से वर मांगने को कहा।

सुलक्षणा ने जब नेत्र खोले, तब देखा कि सामने भगवान त्रिलोचन खड़े हैं। उनके साथ उमा हैं। सुलक्षणा ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। इतने में ही उसकी दृष्टि सामने खड़ी उस बकरी पर पड़ी। उसने सोचा, इस लोक में अपने स्वार्थ के लिए तो सभी जीते हैं, पर जो परोपकार के लिए जीता है, उसी का जीवन सफल है। वह बोली, कृपानिधान! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो पहले इस बकरी पर कृपा करें।

सुलक्षणा की बात सुनकर भगवान शंकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती से कहा, देवी! देखो, साधुपुरुषों की बुद्धि ऐसी ही परोपकारमयी होती है। वास्तव में एकमात्र परोपकार ही संग्रहणीय है। सभी संग्रहों का क्षय हो जाता है, पर एकमात्र परोपकार ही चिरस्थायी होता है। अब तुम्ही बताओ, इस बकरी एवं सुलक्षणा का मैं कौन-सा उपकार करूं।

पराम्बा देवी पार्वती ने कहा, यह शुभलक्षणा- सुलक्षणा तो मेरी सखी होकर रहे। यह बालब्रह्मचारिणी है, मेरी बड़ी प्रिया है, इसलिए यह दिव्य शरीर धारण कर सदैव मेरे पास रहे और यह बकरी काशिराज की कन्या हो और बाद में उत्तम भोगों को भोगकर मोक्ष को प्राप्त हो। इसने शीत आदि की चिंता न कर यहां स्नान किया है। इसलिए इस कुंड का नाम आज से बर्करीकुंड हो जाये। यहां इसकी प्रतिमा की सभी पूजा करें। एवमस्तु कहकर भगवान अंतर्धान हो गये। सुलक्षणा ने अपने साथ उस बकरी का भी परम कल्याण सिद्ध कर लिया।

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