Wednesday, September 23, 2020
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‘सिटीजन मुखर्जी’: राष्ट्रपति जो प्रधानमंत्री न बन सके

भारतीय राजनीति की नब्ज पर गहरी पकड़ रखने वाले प्रणव मुखर्जी को एक ऐसी शख्सियत के तौर पर याद किया जाएगा, जो देश का प्रधानमंत्री हो सकता था, लेकिन अंतत: उनका राजनीतिक सफर राष्ट्रपति भवन तक पहुंच कर संपन्न हुआ। उनके राजनीतिक जीवन में एक समय ऐसा भी आया था जब कांग्रेस पार्टी में राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ते हुए वह पीएम पद के बहुत करीब पहुंच चुके थे लेकिन उनकी किस्मत में देश के प्रथम नागरिक के तौर पर उनका नाम लिखा जाना लिखा था। ‘सिटीजन मुखर्जी’ ने 10 अगस्त को ट्विटर का इस्तेमाल करते हुए दुनिया को यह सूचना दी कि वे कोरोना से संक्रमित हो गए हैं। यही उनकी आखिरी पोस्ट थी और जनता से मुखातिब उनके आखिरी शब्द भी।

पश्चिम बंगाल में जन्मे इस राजनीतिज्ञ को चलता फिरता ‘इनसाइक्लोपीडिया’ कहा जाता था। उनकी याद‍्दाश्त क्षमता, तीक्ष्ण बुद्धि और मुद्दों की गहरी समझ का हर कोई मुरीद था। साल 1982 में वे भारत के सबसे युवा वित्त मंत्री बने। फिर विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त व वाणिज्य मंत्री के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। वे भारत के पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जो इतने पदों को सुशोभित करते हुए इस शीर्ष संवैधानिक पद पर पहुंचे। उन्होंने इंदिरा गांधी, पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह जैसे प्रधान मंत्रियों के साथ काम किया। उनका राजनीतिक जीवन एक समर्पित कांग्रेस कार्यकर्ता का रहा। साल 1987 से 1988 तक के बीच का कालखंड ऐसा रहा जब वे पार्टी से बाहर रहे।

मुखर्जी भारत के एकमात्र ऐसे नेता थे जो देश के प्रधानमंत्री पद पर न रहते हुए भी 8 वर्षों तक लोकसभा के नेता रहे। उनके राजनीतिक सफर की शुरूआत 1969 में बांग्ला कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा सदस्य बनने से हुई। बाद में बांग्ला कांग्रेस का कांग्रेस में विलय हो गया था।

पीएम बनने की थी उम्मीद

उनका राजनीतिक सफर बहुत भव्य रहा जो राष्ट्रपति भवन पहुंचकर संपन्न हुआ। लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना उन्हें नसीब नहीं हुआ। हालांकि उन्होंने खुलकर इस बारे में अपनी इच्छा व्यक्त कर दी थी। अपनी किताब ‘द कोअलिशन इयर्स’ में मुखर्जी ने माना कि मई 2004 में जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था तब उन्होंने उम्मीद की थी कि वह पद उन्हें मिलेगा। ‘अंतत: उन्होंने (सोनिया ने) अपनी पसंद के रूप में डॉक्टर मनमोहन सिंह का नाम आगे किया और उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। उस वक्त सभी को यही उम्मीद थी कि सोनिया गांधी के मना करने के बाद मैं ही प्रधानमंत्री के रूप में अगली पसंद बनूंगा।’ शुरुआती दौर में उन्होंने अपने अधीन काम कर चुके मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल होने से मना कर दिया था, लेकिन सोनिया गांधी के अनुरोध पर बाद में वह सहमत हुए।

जड़ों से जुड़े थे

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के मिराती गांव में 11 दिसंबर 1935 को जन्मे मुखर्जी को जीवन की आरंभिक सीख अपने स्वतंत्रता सेनानी माता-पिता से मिली। उनके पिता कांग्रेस के नेता थे, जिन्होंने बेहद आर्थिक संकटों का सामना किया। सत्ता के गलियारों में रहने के बावजूद मुखर्जी कभी अपनी जड़ों को नहीं भूले। राष्ट्रपति बनने के बाद भी दुर्गा पूजा के समय वे अपने गांव जरूर जाया करते थे। मंत्री और राष्ट्रपति रहते पारंपरिक धोती पहने पूजा करते उनकी तस्वीरें अक्सर लोगों का ध्यान आकर्षित करती थीं।

विवाद और सम्मान

राष्ट्रपति के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के एक साल बाद 2018 में मुखर्जी के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर जाने और वहां समापन भाषण देने को लेकर खासा विवाद हुआ था। बाद में उन्हें भाजपा-नीत केंद्र सरकार द्वारा साल 2019 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। इस पर राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा हुई। राष्ट्रपति के रूप में भी उन्होंने एक अमिट छाप छोड़ी। इस दौरान उन्होंने दया याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाया। उनके सम्मुख 34 दया याचिकाएं आईं और इनमें से 30 को उन्होंने खारिज कर दिया।

मोदी ने ट्वीट किया चित्रप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक संदेश के साथ एक तस्वीर ट्वीट की है जिसमें वह प्रणब मुखर्जी के पैर छूकर आशीर्वाद लेते दिख रहे हैं। पीएम ने याद किया कि कैसे 2014 में प्रधानमंत्री बनने पर मुखर्जी का उन्हें भरपूर सहयोग और आशीर्वाद मिला। 2017 में एक बार तत्कालीन राष्ट्रपति मुखर्जी की तारीफ करते-करते मोदी रो दिए थे।

उन्होंने तब कहा था कि मुखर्जी उनका ऐसे ख्याल रखते हैं जैसे कोई पिता अपनी संतान का रखता है।

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