Wednesday, September 30, 2020
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हिंदी फीचर फिल्म : जिस देश में गंगा बहती है

डाकुओं के लिए मन में बनी बुरी छवि देखकर जब कम्मो (पद्मिनी) राज (राजकपूर) को यह कहकर टोकती है कि वह डाकुओं के बारे में गलत सोचते हैं। दरअसल, डाकू ही तो अमीरों का धन लेकर गरीबों में बांटने का काम करते हैं। कम्मों की डाकुओं के बारे में नयी व्याख्या सुनकर राजू अपनी गलती तुरंत सुधारते हुए कहता है कि फिर तो कम्मो जी तुम लोग तो चोचलिस्ट (सोशलिस्ट) हो, जो अमीरों और गरीबों के बीच चीजों को ‘बरोबर’ बांटने का काम करते हो? जब कम्मो की तरफ से जवाब हां में मिलता है तो उसे डाकुओं का फलसफा समझ में आता है कि डाकू बुरे नहीं होते न ही वह किसी दूसरे जहां से आये एलियन होते हैं। वे इसी धरती के जीव हैं जो जीवन के किन्हीं अभावों के कारण समाज की मुख्यधारा से कटकर ऐसा जीवन बिताने को मजबूर हैं। यही राजकपूर की फिल्मों का केंद्र बिंदु है, जिसे पढ़े-लिखे समाजवाद और सोशलिज्म कहते हैं। यह बात अलग है कि भांडगिरी करते-करते फिल्म का हीरो (राजकपूर) सोशलिज्म का पहाड़ा भी सीख गया है जिसे वह ‘चोचलिज्म’ कहता है। यह फिल्म 1960 में रिलीज हुई। तब विश्वभर के साहित्य, कला में समाजवाद को लेकर काफी कुछ लिखा जा रहा था। सिनेमा भी इससे अछूता नहीं था फिर राजकपूर ने जिन आसान लफ्जों में दर्शकों को समाजवाद के मायने समझाये वैसा कम ही निर्देशक कर पाये। हालांकि, इस फिल्म का निर्देशन राजकपूर ने नहीं बल्कि उनकी फिल्मों के सिनेमैटोग्राफर राधू कर्माकर ने किया था। प्रोडक्शन राजकपूर की थी। यह फिल्म राधू कर्माकर की पहली और आखिरी निर्देशित फिल्म थी यह राजकपूर प्रोडक्शन की आखिरी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म थी, जिसने उस वक्त की बाक्स ऑफिस पर करोड़ों रुपयों की कमाई की थी। छठे दशक में आंकड़ा लाखों तक पहुंचे, यही बड़ी गनीमत समझी जाती थी फिर इस फिल्म ने तो उस समय ही 2 करोड़ रुपये कमाये थे। शूटिंग मध्य प्रदेश में हुई थी और यहीं से ही पता लगता है कि सिनेमैटोग्राफर कौन होगा? ‘ओ बसंती पवन पागल’ गाना जहां फिल्माया गया है ऐसी फोटोग्राफी राधू ही कर सकते हैं। कहानी तो कहानी, गीत-संगीत और सितारों ने भी फिल्म में कम कमाल नहीं किया। भोले-भाले बुद्धू का किरदार राजकपूर ही निभा सकते हैं। और पुरानी अदाकारा व नृत्यांगना पद्मिनी कम्मो के कैरेक्टर में इस कदर चुभी हैं कि लगता नहीं कि किसी अन्य अदाकारा के बस की बात थी। भरा-पूरा गठीला-बदन उस पर ग्राम्य बाला खासकर डाकुओं के सरदार की बेटी होने का तारी होता नशा… उफ दर्शकों को किंकर्तव्यविमूढ़ करने के लिए पर्याप्त है। राका के रोल में प्राण की भूमिका। गजब की सिलेक्शन थी पात्रों की। गीत-संगीत ने समाजवाद की कड़ाही में रोमांस की जो छौंक लगायी, उसे देर तक दर्शक नथुनों में ही समाने का भ्रम पालते रहे। यही राजकपूर की फिल्मों का तरीका है। इसे इस तरह समझना चाहिए कि जुम्मा-जुम्मा देश को आजाद हुए अभी 13 साल ही हुए थे। जागीरदार अभी भी समाज की जड़ों को खोखला कर रहे थे। सरकार की नजरों में रहनुमा बने ये लोग गरीब/आम बंदे को खास शोषित करते थे। यही शोषण जब हद से ज्यादा गुजरता तो समाज की कदरों-कीतों को मानने वाला व्यक्ति विद्रोही हो जाता है। भले ही वह बूट-पॉलिश का हीरो हो फिर आवारा का जेब काटने वाला आम व्यक्ति जो समाज से बराबरी का हक मांगता है। उसे भी बहार चाहिए उसे भी रंग चाहिए जीवन के। फिर श्री420 के नायक को तो नहीं भूल सकते जो फुटपाथ से उठकर एक दिन अमीरों का खुदा बन बैठा लेकिन भीतर का इंसान वही आम आदमी है जो प्यार करता है और परिवार के साथ सुखमय जीवन चाहता है। यही राजकपूर का समाजवाद में रूमानियत का तड़का है, जिसने गैर-बराबरी के व्याकरण ज्यादा आसान करके समझाए। फिल्म बेशक राधू कर्माकर ने निर्देशित की है लेकिन इसे राजकपूर के नाम से ही जाना जाता है, बात कहने के तरीके से। यह फिल्म सुपरहिट थी। 9वें फिल्म फेयर समारोह में इसने कई वर्गों के चार पुरस्कार जीते। सर्वोत्तम मूवी, एक्टर, संपादन, आर्ट डायरेक्शन ऐसे वर्ग थे, जहां उन्होंने पुरस्कार जीते। पार्श्व गायन के लिए मुकेश को, सर्वोत्तम अभिनेत्री पद्मिनी, गीत रचना शैलेंद्र को, सर्वोत्तम संगीत निर्देशक शंकर जयकिशन को नामांकित किया गया। इसके अतिरिक्त इसे नेशनल फिल्म अवार्ड समारोह में 1960 की सर्वोत्तम फिल्म घोषित की गई। यही फिल्म थी, जिसने बाद में कई डाकुओं को समर्पण के लिए विवश किया। बेशक इस भगीरथ प्रयास के लिए काफी श्रेय विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण को भी जाता है, लेकिन डाकुओं का जीवन रूमानियत से भरा इसी फिल्म से ही। अब चलें कहानी की ओर—राजू बेसहारा व गरीब लड़का है जो घर-घर गीत गाकर अपनी रोजी कमाता है। एक दिन उसे एक घायल व्यक्ति मिला, जिसकी उसने दिलोजान से मदद की। वह घायल व्यक्ति कोई और न होकर डाकुओं का सरदार होता है। बाद में पुलिस का भेदिया समझ डाकू उसे उठा ले जाते हैं। डाकुओं के खेमे में रहते-रहते वह सरदार की बेटी कम्मो से आंख लड़ा बैठता है। एक बार लूटमार करते हुए जब डाकुओं से नव ब्याहता जोड़े की हत्या हो जाती है, राजू द्रवित होकर पुलिस को जानकारी देने के लिए डाकुओं का खेमा छोड़ देता है। लेकिन सरदार की राजू भक्ति देखकर राका सरदार की हत्या कर देता है और खुद सरदार बन जाता है। वह कम्मो से शादी करना चाहता है। ये सारी बातें राजू पुलिस को बता देता है और पुलिस को डाकुओं को समझाने के लिए कहता है लेकिन दोनों ओर से चल रही गोलाबारी ने राजू को अजीब हालत में खड़ा कर दिया है कि कहां उसने शिकायत डाकुओं को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए की थी और कहां पुलिस अपने तमगों की खातिर डाकुओं को खत्म करने पर तुली है? लेकिन राजू के मान-मनव्वल के सदके डाकू मुख्यधारा में शामिल होने के लिए तैयार हो जाते हैं। ‘जागते रहो’ के बाद ‘जिस देश में गंगा बहती है’ राजकपूर प्रोडक्शन की ऐसी फिल्म है, जिससे प्यार मुहब्बत के अलावा सस्पेंस, थ्रिल, जातिपाति, ऊंच-नीच, अच्छाई-बुराई सब कुछ विद्यमान है। यह राजकपूर प्रोडक्शन का उम्दा शाहकार है जिसे बेशक राजकपूर ने नहीं डायरेक्ट किया था मगर, राधू कर्माकर की इस इकलौती डायरेक्शन ने राजकपूर को इस क्षेत्र में काफी पीछे छोड़ दिया। यह फिल्म क्लासिक फिल्म होने के नाते इसलिए भी मशहूर है क्योंकि राजकपूर प्रोडक्शन नरगिस के बगैर भी फिल्में बनाकर देखना चाहते थे और पहली ही फिल्म ने उन्हें कामयाबी की मंजिल तक पहुंचा दिया। इसी फिल्म से प्राण को राका जैसा रोल मिला और उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। गीत, संगीत, सितारे व पटकथा सभी कुछ बेहतर था। पाठक यह फिल्म देख लें तो सही होगा। इसी फिल्म के दौरान राजकपूर के मन में ‘राम तेरी गंगा मैली’ बनाने का विचार आया

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