Saturday, September 26, 2020
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जीवन संदेश हैं गणेश

संसार की कई संस्कृतियों को भारत की इस आस्था पर आश्चर्य होता है— हमारे देव गणपति हमें बुद्धि का वर देते हैं। शुभ कार्य शुरू करने से पहले भविष्य में मंगल होने का वचन भी हम उन्हीं से पाते हैं। विदेशी संस्कृतियों को यह समझना मुश्किल लगता है कि हाथी जैसे सिर की आकृति, चूहे की सवारी करने वाले और चार हाथों में कुछ अलग-अलग चीजें थामने वाले रूप के इस स्वामी से भारतवासियों के बुद्धि के कपाट कैसे खुलते होंगे? उनके जीवन में मंगल या कल्याण इनके माध्यम से कैसे होता होगा? ऐसा नहीं कि यह केवल विदेशियों का प्रश्न है, कई बार कुछ भारतीयों के मन में भी यह सवाल रहता है।

इसका जवाब बहुत आसानी से गणपति जी दे रहे हैं। लेकिन वह जवाब जानने के लिए गणपति जी की पूजा करने के साथ कुछ और भी करना होगा। पूजा से उनकी कृपा का पात्र बनना एक बात है। लेकिन, अर्चना का अगला भाग है गणपति जी के प्रतीकों यानी उनकी अनोखी आकृति के सिर, कान, पेट, भुजाओं में निहित अर्थों को समझना। उनको लगने वाले भोग के मायने समझना। बस इन प्रतीकों को समझने के साथ-साथ मनुष्य की बुद्धि के द्वार खुलने के नुस्खे पता चलते जाते हैं। हर साल गणेश उत्सव का अर्थ ही यही है कि आप उनके प्रतीकों के अर्थों को दोहराकर अपनी बुद्धि को ऊंचा बनाए रखने का अभ्यास जानते रहें।

गणेश जी के प्रतीकों के प्रत्यक्ष प्रमाण

गणेश जी के बड़े सिर का निहितार्थ है कि सोचने का दायरा बड़ा रखना चाहिए। जब सोच बड़ी होगी तो विचार भी बड़ा होगा। अर्थात‍् मनुष्य अपने विचार के स्तर से परिभाषित होता है, इसके अलावा कुछ भी मनुष्य को परिभाषित नहीं कर सकता। धन और सुविधाओं की कुछ भूमिका हो सकती है, लेकिन यह किसी व्यक्ति के स्तर को परिभाषित करने का पैमाना नहीं है। यानी ऊंचे और मजबूत विचार से ही व्यक्ति का उद्धार संभव है।

उनके हाथी जैसे आकार वाले कान हैं सूप जैसे। शास्त्र अनुसार सूप का धर्म है… ‘सार-सार को गहि रहै थोथा देई उड़ाय।’ यानी सूप अनाज-अनाज को रखता है और बाकी अवशेष को उड़ा देता है। यही बात गणेश जी मनुष्य को कहते हैं कि विभिन्न चीजों का सार पकड़ो और निरर्थक बातों को छोड़ो। भारतीय ज्ञान परंपरा में गणेश जी की कहानियां यही संदेश देती हैं कि अगर मनुष्य हर छोटी, मोटी या कहें बेतुकी बातों से बुद्धि को भरकर रखेगा, तो इसकी ताकत कमजोर हो जाएगी। यह कमजोर हुई, तो उचित, अनुचित के भेद की शक्ति घट जाएगी।

अब समझते हैं गणेश जी आंखों के अर्थ। भारतीय मनीषियों का मानना है कि गणेश जी अपनी सूक्ष्म आंखों से यह संदेश देते हैं कि इंसान को दुनियादारी बहुत सूक्ष्म तरीके से समझनी चाहिए। अगर ऊपर-ऊपर से चीजों को जानेंगे, तो बुद्धि कभी भी गहराई के तल को छू नहीं पाएगी।

उनका बड़ा नाक भी मनुष्य की बुद्धि के ताले को खोलता है। गणेश जी बड़े नाक से संदेश देते हैं कि चीजों की गंध को दूर से पहचानो यानी जो आपके आसपास चल रहा है, उसको शिद्दत से अनुभव करो, ताकि आपको इन घटनाओं के भविष्य के परिणामों की अनुभूति होने लगे।

अब बात गणेश जी के पेट की। उनके पेट का अर्थ कोई ठोक-ठोक कर पेट को भरना नहीं है। वो भूख को नियंत्रित करने की सीख देते हैं। इस नियंत्रण से जहां मनुष्य का संयम गुण विकसित होता है, वहीं विचार शक्ति भी मजबूत होती है।

गणेश जी का मोदक भी बुद्धि को मजबूत करने की पद्धति बताता है। उनको श्रद्धा से मोदक का भोग लगाने के निहितार्थ बड़े गहरे हैं। मोदक का आकार ज्ञान को लेकर हमारी समझ को स्पष्ट करता है। इसका ऊपरी भाग कहता है कि ऊपर से हमें ज्ञान बहुत छोटे आकार का मालूम पड़ता है, जबकि यह मिलता है गहराई में जाने से। अभ्यास करने पर पता चलता है कि ज्ञान तो अथाह है। और मोदक का निचले भाग का स्वाद इस बात का प्रतीक है कि गहराई में जाकर पाए ज्ञान का स्वाद बहुत मीठा होता है।

उनका स्वस्तिक चिन्ह मनुष्य को स्पष्ट करता है कि उसका कल्याण कैसे संभव है। इसका अर्थ है कि जीवन में आनंद धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के बराबर स्थान से आएगा। अगर किसी एक-दो को ही पकड़ोगे, तो जीवन का आनंद मिट जाएगा। क्योंकि आज काफी लोग मान बैठे हैं कि धन की अधिकता उनके जीवन का पूरा उद्धार कर देगी।

गणेश जी प्रदत्त बुद्धि की विशेषता

अब सवाल यह है कि किसी धर्म, आस्था को न मानने वाले भी तेज बुद्धि वाले होते हैं। फिर गणेश जी के प्रतीकों से बुद्धि पाने वाले किन मायनों में नास्तिक से अलग होते हैं। इसका जवाब है कि कोई भी आस्था न रखने वाले की बुद्धि चीजों की तेज गणनाएं कर सकती है। लेकिन उस बुद्धि से ऊपर की चीज विवेक यानी सत्य और असत्य का स्पष्ट बोध करने की शक्ति वह नहीं पा सकता। जबकि गणेश जी अपने प्रतीकों के माध्यम से यही विवेक शक्ति जाग्रत करते हैं।

शास्त्रों में गणपति का उल्लेख…

भारतीय ज्ञान परंपरा में सबसे पहले ऋग्वेद में ही गणों (देवों) के पति यानी गणपति जी का जिक्र मिलता है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र मोहन मिश्र के अनुसार, ‘अथर्ववेद के भाग अथर्वशीर्ष उपनिषद में उन्हें परम ब्रह्म बताया गया है। पुराणों में भी उनकी पर्याप्त व्याख्याएं मिलती हैं।’ भारतीय शास्त्रों पर निरंतर शोधरत एसडी कॉलेज अम्बाला छावनी के डॉ. आशुतोष अंगीरस कहते हैं, ‘शुरुआत में तो वेद उनका परिचय गणों ( देवताओं) में श्रेष्ठ के रूप कराते हैं। जिस बुद्धि-विवेक से यह संसार आगे बढ़ा, उन्हें इसका स्वामी बताया गया है। लेकिन जो हाथी जैसी सूंड वाले गणपति को हम एक निश्चित रूप में देखते हैं, उसका उल्लेख बहुत बाद में है। अर्थात‍् भारतीय शास्त्र में सर्वप्रथम गणपति ज्ञान-विवेक और जनकल्याण की अवधारणा के रूप में मिलते हैं। प्रकट देवता रूप में तो उनका जिक्र पुराणों में आकर होता है।’ भारतीय शब्दावली में गणपति गणों के समूह को कहते हैं, यानी स्वस्थ बुद्धि, स्वस्थ व्यवहार वाले व्यक्तियों का समूह। इस गणपति से ही हमारा आज का गणतंत्र बना है। और इस गण यानी लोगों के समूह का उद्धार तब होता है, जब उनका ख्याल रखने वाला, उनका पालन करने वाला कोई उच्च गुणों वाला जन हो। जैसा कि शुक्ल यजुर्वेद के 23वें अध्याय में मंत्र है:

‘गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधपति’

अर्थात‍् गणों के पति आप लोगों का प्रिय करने वाले स्वामी हों। आप लोगों को धन रूपी भौतिक और प्रेम, सत्कार रूपी अभौतिक संपत्तियां उपलब्ध करायें। शास्त्र कहता है कि जो किसी समूह का स्वामी बनता है, उसमें यह विशेषता होनी चाहिए। ऐसा जान पड़ता है कि गणपति जी ने पर्याप्त प्रमाण देकर लोगों के मन में यह आस्था बनाई है कि वह पूरे विश्वास से उनका यह आह्वान करें-

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