Sunday, September 20, 2020
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कानून के साथ ही सोच भी बदलें

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते हिंदू उत्तराधिकार कानून 2005 की नई व्याख्या की है। इस व्याख्या से पैतृक संपत्ति में बेटियों की बराबरी का अधिकार थोड़ा और स्पष्ट हुआ है। हालांकि इस नई व्याख्या के बाद भी यह सवाल बना रहेगा कि हमारे समाज की जो स्थिति है, उसमें क्या वास्तव में किसी बेटी को पैतृक संपत्ति में बराबरी की हिस्सेदारी आसानी से प्राप्त हो सकती है? उत्तराधिकार कानून 2005 के डेढ़ दशक के धरातली अनुभव तो इस संबंध में बहुत उत्साह पैदा नहीं करते। फिर भी उत्तराधिकार कानून की नयी व्याख्या संभावनाओं का द्वार तो खोलती ही है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी नई व्याख्या में कहा है कि 2005 से पहले जन्मी बेटियों को भी संपत्ति में उस स्थिति में भी अधिकार होगा, यदि उनके पिता की मृत्यु कानून लागू होने से पूर्व हो गई हो लेकिन इस कानूनी व्यवस्था को जमीन पर उतारने के रास्ते में कई बाधाएं हैं। ये बाधाएं समाज की पितृसत्तात्मक सोच से जुड़ी हुई हैं। अभी तो किसी कारणवश यदि शादीशुदा बेटी को मां-बाप के घर रहना पड़ जाए तो उसे पूरा परिवार बोझ समझता हैै। बेटियां खुद को अपराधी महसूस कर वहां मजबूरी में रहती हैं। जब तक यह सोच और स्थिति नहीं बदलेगी तब तक महज कानूनी व्यवस्था से बेटियों को उनका वाजिब हक दिलाना संभव नहीं लगता।

स्थितियों का आकलन करने पर मोटे तौर पर तीन बड़ी बाधाएं सामने दिखती हैं। पहला, हमारे समाज में अब भी बेटी और पिता दोनों के मन में यह धारणा बनी रहती है कि शादी के बाद वह पराई हो जाती है। इसके बाद भाई, भाभियों या पिता से कुछ भी मांगते वक्त उन्हें एक संकोच से होकर गुजरना पड़ता है। ऐसे में क्या वहां वह अपने अधिकार की बात को सहज ही रख पाएंगी। फिर सम्पत्ति का बंटवारा अक्सर विवाद की वजह बनता है, ऐसे में बहन को भी बंटवारे में शामिल करना हमारे समाज को कहां तक गवारा होगा।

दूसरा, गांव में लड़कियों की शिक्षा और अपने हक के प्रति जागरूकता का ग्राफ अब भी शून्य से बहुत ऊपर नहीं उठ पाया है। जो लड़कियां अपने मूल अधिकारों की समझ नहीं रखती, उनसे भला कैसे आशा की जा सकती है कि वह जरूरत पड़ने पर अपने पिता की संपत्ति में मिले कानूनी अधिकार का इस्तेमाल अपनी भलाई के लिए कर सकती हैं। जो स्त्रियां पति की प्रताड़ना एवं शारीरिक हिंसा को भोग कर न तो पति के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का साहस कर पाती हैं और न ही उसे छोड़ने का, भला वे अपने अधिकारों की लड़ाई अपने ही बाप या भाई से लड़ पाएंगी।

तीसरा, पिता या भाई स्वयं आगे बढ़कर अपनी संपत्ति में बेटी या बहन को हिस्सा दे देंगे, इसकी संभावना कम ही दिखती है। क्योंकि जिस सोच के तहत उनका लालन-पालन हुआ है वह सोच इतनी उदार नहीं कि स्त्री को कहीं भी अपने बराबर आकर खड़ा होने की अनुमति दे। पिता के पास वही रूढ़िवादी तर्क अब भी मौजूद होगा कि बेटी का हिस्सा ससुराल में होता है। लेकिन यदि बेटी ससुराल में प्रताड़ित होती है और उसके पास आर्थिक संबल नहीं होता है तब उसे क्या करना चाहिए, इस पर वे मौन हो जाते हैं।

ये तीनों ऐसी स्थितियां हैं, जिनमें बेटी को स्वयं आगे बढ़कर अपने अधिकार की बात करनी होगी, जो रिश्ते में दरार और कलह की वजह बन सकता है। क्या बेटी अपने अधिकार के लिए अपने ही प्रियजनों से मौखिक या कानूनी झगड़ा मोल लेना चाहेगी। दरअसल कानून बनाने और उसे संशोधित करने से अधिक अहम है कि उसे हमारे समाज में लागू कैसे कराया जा सकता है, इस पर चर्चा हो। बेहतर तो यही होगा कि समाज की सोच बदलने की दिशा में काम किया जाए और वह इस कानून को स्वेच्छा से स्वीकार करें। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता तब तक कोई ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि लड़की की शादी के वक्त ही उसे प्रॉपर्टी में अधिकार देने का नियम भी बन जाए। ऐसा न करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो।

इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर कानून की बंदिशें चोट करती रही हैं, आगे भी करेंगी लेकिन सबसे जरूरी सामाजिक सोच में बदलाव है।

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