Wednesday, September 30, 2020
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मधुरता का रहस्य

एक पथिक ने सरिता से पूछा—हे सरिता, तू इतनी छोटी है किंतु तेरा जल कितना मधुर तथा तृप्तिकारक है और वह सागर इतना विशाल है, परंतु उसका जल खारा है। इसका आखिर रहस्य क्या है? वेग से बहती सरिता को किसी की बात सुनने की फुर्सत ही कहां थी। सरपट दौड़ते-हांफते उसने इतना मात्र कहा कि सागर से ही जाकर पूछो। क्षितिज तक विस्तृत और गर्जन-सर्जन करने वाले सागर के पास पथिक गया और उसने उससे वही प्रश्न किया? सागर बोला—पथिक, मेरी बात ध्यान से सुनो। सरिता एक हाथ से लेती है दूसरे हाथ से देती है। वह अपने पास एक पल के लिए भी कुछ नहीं रखती। दूसरों को कुछ देने के लिए ही वह दिन-रात दौड़ती रहती है। किंतु मैं सब से केवल लेता हूं, देता तनिक भी नहीं। यही कारण है कि मेरा संचित जल खारा है और सरिता का जल मीठा। पथिक ने समझ लिया कि जो एक हाथ से देता है और दूसरे हाथ से बांट देता है, उसी के जीवन में माधुर्य रहता है। संग्रह करने वाले मनुष्य का जीवन नीरस बनकर रह जाता है।

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