Sunday, September 20, 2020
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सुर-संसार में सन्नाटा

महान शास्त्रीय गायक पंडित जसराज का अमेरिका के न्यूजर्सी में दिल का दौरा पड़ने से सोमवार की सुबह निधन हो गया। लॉकडाउन के बाद से वे न्यूजर्सी में ही थे। उनकी बेटी दुर्गा जसराज ने यह जानकारी दी।

परिवार ने एक बयान में कहा, ‘हम प्रार्थना करते हैं कि भगवान कृष्ण स्वर्ग के द्वार पर उनका स्वागत करें जहां वह अपना पसंदीदा भजन ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ उन्हें समर्पित करें। हम उनकी आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना करते हैं। बापूजी जय हो।’

इस साल जनवरी में अपना 90वां जन्मदिन मनाने वाले पंडित जसराज ने आखिरी प्रस्तुति विगत 9 अप्रैल को हनुमान जयंती पर फेसबुक लाइव के जरिये वाराणसी के संकटमोचन हनुमान मंदिर के लिये दी थी।

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि…

‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले’ पंडित जसराज ने इस साल जनवरी में अपने 90वें जन्मदिन पर ये शे’र पढ़ा था। उनका सबसे बड़ा योगदान शास्त्रीय संगीत को जनता के लिये सरल और सहज बनाना रहा जिससे उसकी लोकप्रियता बढ़ी। जगजीत सिंह की गजल ‘सरकती जाये है रुख से नकाब’ उनकी पसंदीदा थी और एक बार दिन भर में वह सौ बार इसे सुन गए थे। एक खासियत यह कि खुद अपने शिष्यों से सीखने को लालायित रहते थे। 28 जनवरी 1930 को हरियाणा के हिसार में जन्मे मेवाती घराने के पंडित जसराज का 8 दशक से अधिक का सुनहरा संगीत सफर रहा, कई सम्मान और पुरस्कार मिले लेकिन पिछले साल इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने अगस्त में सौरमंडल में एक छोटे ग्रह का नाम उनके नाम पर रखा और यह सम्मान पाने वाले वह पहले भारतीय कलाकार बने। वे कहते थे, ‘इंसान की ख्वाहिश कभी पूरी नहीं होती। पद्मश्री मिला तो मेरी आधी जान निकल गई थी। उसके बाद पद्मविभूषण तक मिला। बिना सोचे यहां तक आ गए तो आगे पता नहीं ईश्वर ने क्या लिखा है, उन्हीं पर छोड़ देते हैं।’ 1952 में तत्कालीन नेपाल नरेश त्रिभुवन विक्रम के सामने दी गई प्रस्तुति पर उन्हें पुरस्कार में 5000 मोहरें मिलीं तो वह लगभग अचेत हो गए कि गाने के लिये पैसे भी मिलते हैं।

पैतृक गांव पीलीमंदौरी पहुंचते ही मिट्टी को चूमा था पंडित जी ने

फतेहाबाद (निस) : पूरे विश्व को अपनी प्रतिभा से प्रशंसक बनाने वाले शास्त्रीय संगीत के बेताज बादशाह पंडित जसराज के निधन से हर आंख नम है। फतेहाबाद जिला के गांव पीली मंदोरी में जन्मे पंडित जसराज के निधन से गांव में मातम का माहौल है। 28 जनवरी 1930 को गांव पीलीमंदौरी में जन्मे पंडित जसराज 90 साल की उम्र में हमें छोड़ गए हैं। वे अंतिम बार वर्ष 2014 में फतेहाबाद में अपने पैतृक गांव पीलीमंदौरी में आए थे। पंडित जसराज जब अपने गांव पीली मंदोरी में पहुंचे तो उन्होंने गाड़ी से नीचे उतरते ही गांव की मिट्टी को चूमा। ग्रामीणों से बागड़ी भाषा में बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि मैं अपनी जन्मभूमि से असीम प्रेम करता हूं, मेरे लिए इस गांव की भूमि वृंदावन से कम नहीं है। बागड़ी भाषा में ग्रामीणों से बोले कि मैं थारो वो ही जस्सा हूं, जो इस गांव की मिट्टी में पला बढ़ा है। अब मैं तो यहां से चला जाऊंगा लेकिन मेरा मन यही रहेगा। उनके जन्मदिवस पर पूरी पंचायत ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस दौरान उन्होंने अपने पिता पंडित मोतीराम के नाम पर एक लाइब्रेरी व खुद के नाम पर एक पार्क का शुभारंभ किया था। पंडित जसराज के पिता पंडित मोतीराम और चाचा ज्योतिराम जम्मू कश्मीर राजघराने के गायक थे। पंडित जसराज ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा अपने पिता, चाचा और बड़े भाई मनीराम से ली थी।

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