Wednesday, September 23, 2020
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दुख का अहसास

एक बार एक नवयुवक ने मास्टर जेन से पूछा, ‘मास्टरजी, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूं, कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं।’ मास्टरजी बोले, ‘पानी के गिलास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो।’ युवक ने ऐसा ही किया। ‘इसका स्वाद कैसा लगा?’ मास्टर ने पूछा। ‘बहुत ही खराब, … एकदम खारा।’ युवक थूकते हुए बोला। मास्टरजी मुस्कुराते हुए बोले, ‘एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक ले लो और मेरे पीछे-पीछे आओ।’ दोनों थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए। ‘चलो, अब इस नमक को पानी में दाल दो।’ मास्टर ने निर्देश दिया। युवक ने ऐसा ही किया। ‘अब इस झील का पानी पीयो। मास्टर बोला। युवक पानी पीने लगा। फिर पूछा, ‘बताओ इसका स्वाद कैसा है?’ ‘ये तो मीठा है , बहुत अच्छा है।’ युवक बोला। मास्टरजी युवक की बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले, ‘जीवन के दुःख बिल्कुल नमक की तरह हैं; न इससे कम, न ज्यादा। जीवन में दुःख की मात्रा वही रहती है, बिल्कुल वही। लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं, ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं। इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद को बड़ा कर लो, …गिलास मत बने रहो, झील बन जाओ।’

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