Saturday, September 26, 2020
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जीवन के हर रंग में हंसते-गाते…कृष्ण

श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। अनूठेपन की पहली बात तो यह कि कृष्ण हुए तो अतीत में हैं, लेकिन हैं भविष्य के। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके। अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ के बाहर हैं। इसके कुछ कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यह कि कृष्ण अकेले ही ऐसे हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं। कृष्ण अकेले ही नाचते हुए, हंसते हुए, गीत गाते हुए हैं। 

समस्त धर्मों ने दो हिस्से कर रखे थे जीवन के- एक वह जो स्वीकार योग्य है और एक वह जो इनकार के योग्य है। कृष्ण अकेले हैं जो समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसलिए इस देश ने और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है।

कृष्ण ने जीवन के सब रंगों को स्वीकार किया। वे प्रेम से भागते नहीं। वे पुरुष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते। वे परमात्मा को अनुभव करते हुए युद्ध से विमुख नहीं होते। वे करुणा और प्रेम से भरे होते हुए भी युद्ध में लड़ने का सामर्थ्य रखते हैं। अहिंसक चित्त है उनका, फिर भी हिंसा के ठेठ दावानल में उतर जाते हैं। अमृत की स्वीकृति है उन्हें, लेकिन जहर से कोई भय भी नहीं है। और सच तो यह है, जिसे भी अमृत का पता चल गया है उसे जहर का भय मिट जाना चाहिए। क्योंकि ऐसा अमृत ही क्या जो जहर से फिर डरता चला जाए! और जिसे अहिंसा का सूत्र मिल गया उसे हिंसा का भय मिट जाना चाहिए। ऐसी अहिंसा ही क्या जो अभी हिंसा से भी भयभीत और घबराई हुई हो! और ऐसी आत्मा ही क्या जो शरीर से भी डरती हो और बचती हो! और ऐसे परमात्मा का क्या अर्थ जो सारे संसार को अपने आलिंगन में न ले सकता हो। तो कृष्ण द्वंद्व को एक साथ स्वीकार कर लेते हैं। कृष्ण को समझना बड़ा कठिन है। आसान है यह बात समझना कि एक आदमी संसार को छोड़ कर चला जाए और शांत हो जाए कठिन है इस बात को समझना कि संसार के संघर्ष में, बीच में खड़ा होकर भी शांत हो। आसान है यह बात समझनी कि एक आदमी विरक्त हो जाए, आसक्ति के संबंध तोड़ कर चला जाए और उसमें एक पवित्रता का जन्म हो। कठिन है यह बात समझनी कि जीवन के सारे उपद्रव के बीच, जीवन के सारे धूल-धवांस, कोहरे और आंधियों में खड़ा हुआ दीया हिलता न हो, उसकी लौ कांपती न हो- कठिन है यह समझना। इसलिए कृष्ण को समझना बहुत कठिन था। निकटतम जो कृष्ण के थे, वे भी नहीं समझ सकते थे। 

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