Friday, October 2, 2020
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लंबी डोर वाली राखी

‘मां! कल हमारे स्कूल में राखी मेकिंग कॉम्पटीशन है। मैं भी उसमें भाग लूंगी।’ 10 वर्षीय शानू ने स्कूल बैग एक तरफ रखते हुए कहा। ‘हां-हां जरूर लेना। बचपन में हम अपने भाई के हाथों पर अपनी बनाई हुई राखी ही बांधते थे।’ मां ने मुस्कुराते हुए बताया।

‘मां! राखी का त्योहार क्यों मनाते हैं?’ उसके पीछे-पीछे आती छोटी बहन रानू ने प्रश्न किया। ‘हमारी टीचर कहती है कि इस दिन सब बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और भगवान जी से उनकी लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं।’ शानू ने उसे समझाया। ‘तुम्हारी टीचर एकदम सही कहती है। बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र की दुआ करती हैं और बदले में भाई अपनी बहनों को उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। अब तुम दोनों हाथ-मुंह धो लो, मैं खाना लगाती हूं। फिर तुम्हें राखी बनाने की प्रैक्टिस भी तो करनी है ना,’ कहती हुई मां रसोई की तरफ चल दी। दोनों बहनों की बातें जारी रहीं।

‘और हां! मेरी सहेली नीलू बता रही थी कि उसका भाई उसे गिफ्ट भी देता है।’ शानू ने बहन को बताया। ‘दीदी! हम तो किसी को राखी नहीं बांधते। क्योंकि हमारा कोई भाई ही नहीं है। फिर हमारी रक्षा कौन करेगा? हमें तो कोई गिफ्ट भी नहीं मिलता।’ रानू मायूस हो गई।

‘मैं तुम दोनों को इस काबिल बनाऊंगी कि तुम अपनी रक्षा खुद कर सकोगी। मगर हां! भाई के अलावा कोई और भी है जिसे लंबी उम्र की दुआ की जरूरत है। क्या तुम दोनों उसे राखी बांधना चाहोगी?’ मां फिर से उनकी बातों में शामिल हो गई।

‘कौन है वो?’ बच्चियों ने मां से सवाल किया। ‘ये बेजुबान पेड़। इन्हें लंबी उम्र की बहुत जरूरत है। ये दुनिया के वो भाई हैं जो बिना किसी स्वार्थ के सबकी रक्षा करते हैं। हमें जीने के लिए जरूरी प्राणवायु देते हैं। अगर ये नहीं रहे तो फिर कोई नहीं बचेगा। इसलिए इन्हें राखी बांधनी चाहिए। है ना!’ मां ने कहा। मां की बात सुनकर शानू तो सोच में पड़ गई…।

स्कूल में राखी मेकिंग कम्पटीशन चल रहा है। सब बच्चे रंग-बिरंगी राखियां बना रहे हैं। टीचर पूरे हॉल में घूम-घूम कर उनका जायजा ले रही है।

‘अरे शानू! तुम्हारी राखी की डोर इतनी लंबी कैसे है? राखी हाथ पर बांधी जाती है या पेट पर?’ शानू की राखी पर लगी 2 मीटर लंबी डोरी देख कर टीचर की हंसी फूट पड़ी।

‘मैडम! मैं ये राखी हमारे घर के सामने लगे जामुन के पेड़ को बांधूंगी ताकि उसकी उम्र लंबी हो और वो हमें बरसों तक ऑक्सीजन देता रहे यानी हमारी रक्षा करता रहे ।’ शानू की बात सुनकर टीचर कुछ सोच में पड़ गईं।

‘बच्चो! तुम सब अपनी-अपनी राखियों की डोर लंबी कर लो। हम ये राखियां अपने स्कूल में और सामने वाले पार्क में लगे पेड़ों को बांधेगे।’ टीचर ने हॉल में ऐलान किया तो सब बच्चे आश्चर्य से उनकी तरफ देखने लगे। ‘देखो! हम लोग राखी बांध कर भाई की लंबी उम्र की दुआ करते हैं और वो हमारी रक्षा का वचन देता है। ऐसे ही मनाते हैं ना हम राखी का त्योहार? ‘

‘यस टीचर।’ सभी बच्चे टीचर की बात के जवाब में बोले।

‘लेकिन इस बार हम इस त्योहार में थोड़ा सा बदलाव करेंगे। इस बार हम पेड़ों को उनकी रक्षा का वचन देंगे और वे हमारी लंबी उम्र का वादा हमसे करेंगे।’ टीचर ने समझाते हुए कहा।

थोड़ी ही देर में एक-एक कर सारे पेड़ राखियों से सज गये। बच्चों ने राखी बांधने के साथ-साथ पेड़ को बचाने और नये पेड़ लगाने का भी संकल्प लिया। टीचर ने इस अनोखे आइडिया के लिए शानू की खूब प्रशंसा की।

‘मां! मेरी राखी को कम्पटीशन में फर्स्ट प्राइज मिला है।’ शानू ने चहकते हुए घर में प्रवेश किया तो मां मुस्कुरा दी।

चांदी की राखी

परसों राखी का पर्व होने के कारण हैरी की दीदी रोजलीन आज ननिहाल से नाना जी के साथ वापस घर लौट रही थी। रोजलीन ने कल ही हैरी से मोबाइल पर बात भी की कि वह इस बार उसे चांदी की राखी बांधेगी। यह सुन हैरी काफी खुश था। वह अपने दोस्त मिंटू और मनी को भी यह बात बता चुका था।

हैरी को इंतजार था राखी का। राखी की सुबह हैरी की मम्मी ने उसे जगाया। हैरी उठा और नहा कर आया तो देखा कि उसकी बहन किसी चिंता में कुछ ढूंढ़ रही है। उसे पता चला कि राखी कहीं गुम हो गई। फिर हैरी की मम्मी ने कहा,‘कोई बात नहीं रोजलीन, तुम फिलहाल अपने भैया को बाजार वाली राखी बांध दो। चांदी की राखी मिल जायेगी तो उसे भी बांध देना।’ यह सुन हैरी उदास हो गया और बिना राखी बंधवाए चला गया। रोजलीन ने उसे काफी आवाजें दीं, लेकिन वह चला गया। उसके दोस्त मिंटू और मनी सामने से आ रहे थे तो वह उनसे आंख बचा कर गली में घुस गया। हैरी उदास मन से पास में ही एक पार्क में बैठ गया। उसने देखा कि वहीं उसका सहपाठी पारस बैठा था। हैरी ने पूछा, ‘पारस तुम यहां…?’ ‘हां, हम कल ही सामने वाले किराए के नये मकान में आए हैं, मगर तुम यहां कैसे…?’ पारस ने मुंह पर मास्क लगाते हुए पूछा। हैरी ने पूरी बात बता दी। पारस मुस्करा कर कहने लगा, ‘कमाल है जिसकी कोई बहन नहीं उसकी कलाई सूनी है और जिसकी बहन है उसकी भी कलाई सूनी है।’ ‘मतलब…?’ हैरी ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा। ‘मेरी तो कोई बहन नहीं। मुझे हमेशा, खासकर आज के दिन एक बहन की कमी महसूस होती है। तू है कि एक चांदी की राखी के लिए अपनी बहन का दिल तोड़ आया। मेरी मान। घर जा और अपनी बहन से राखी बंधवा ले।’ ‘पारस तूने मेरी आंखें खोल दीं। मुझे अहसास हो गया कि मैंने जो किया गलत किया।’ हैरी ने मुस्कुरा कर पारस का शुक्रिया किया और तेज कदमों से घर की ओर चल दियार। घर पर रोजलीन राखी की थाली लिए आंगन में उदास बैठी थी। तभी हैरी ने चुपके से अपनी कलाई करते कहा, ‘सॉरी दीदी, मैं एक चांदी की राखी के लिए बेकार में तुमसे खफा हो गया और तुम्हारा दिल तोड़ा। मुझे माफ कर दो।’ ‘मगर भैया, यह देखो मुझे वह चांदी की राखी मिल गई थी…।’ रोजलीन ने थाली में से चांदी की राखी उठा कर हैरी को दिखाते हुए कहा। हैरी बोला, ‘नहीं दीदी, मुझे तो साधारण राखी ही बंधवानी है, वह चांदी की राखी नहीं जिससे मेरी बहन का दिल दुखा।’ कह कर हैरी रोजलीन से राखी बंधवाने लगा तो पास आकर खड़े हुए उनके मम्मी पापा के चेहरे भी खुशी से खिल गए।

अनोखा भैया

मिन्नी और गीता दो बहनें थी। दोनों आपस में बहुत प्यार से रहती थी। मिन्नी समझदार थी। गीता थोड़ा नादान, थोड़ी सी चुलबुली। मम्मी-पापा भी दोनों को बहुत प्यार करते। एक दिन गीता बड़ी उदास लग रही थी। उसकी आंखों में आसूं दिखाई दे रहे थे। मिन्नी को लगा शायद गीता को चोट लग गई, जरूर वो दौड़ते हुए कहीं गिर गई होगी। ‘आज फिर से चोट लग गई क्या। कितनी बार कहा है तुमसे धीरे चला करो। दौड़ो मत।’, मिन्नी ने गीता को पुचकारते हुए कहा। ‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे चोट नहीं लगी है।’ ‘फिर तुम्हारी आंखों में ये आसूं कैसे? मिन्नी ने पूछा। गीता मिन्नी से लिपट कर रोने लगी। ‘अरे, अब क्या हो गया। तुम्हें किसी ने डांटा तो नहीं?‘ मिन्नी ने गीता के आंसू पोछते हुए कहा। ‘राखी आने वाली है। हमारा कोई भाई नहीं है। यही सोच-सोचकर मुझे रोना आ रहा है।‘ गीता ने कहा। ‘बस इतनी सी बात। अच्छे बच्चे नहीं रोते। हम बाजार से राखी लाएंगे और त्योहार मनाएंगे।’ मिन्नी ने कहा।

मिन्नी और गीता बाजार से राखी खरीद लाए। त्योहार वाले दिन गीता ने मिन्नी के कान में कहा-’राखी तो हम ले आये। लेकिन अब किसे बांधें? ‘ मिन्नी ने अपनी कलाई आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘मुझे बांधों। समझो आज के दिन के लिए मैं तुम्हारा भाई हूं।’ गीता ने झट से मिन्नी की कलाई पर राखी बांध दी। फिर मिन्नी ने गीता से कहा, ‘तुम भी अपनी कलाई आगे बढ़ाओ। आज के दिन तुम मेरे राजा भैया हो।’ मिन्नी ने बाहर बगीचे की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘उधर बगीचे में एक और भाई है।’ ‘कहां है हमारा भैया?’ गीता ने प्रश्न किया। ‘वो देखो…’, मिन्नी ने छोटे से आम के पेड़ की तरफ इशारा किया और कहा, ‘आज हम उसे राखी बांधेंगे। उसकी रक्षा का संकल्प लेंगे। उसे पानी देंगे। कल बड़ा होकर वो हमें खाने को मीठे-मीठे आम देगा।’ मिन्नी ने कहा। ये सुनकर गीता बहुत खुश हुई। दोनों ने आम के पेड़ को राखी बांधी। उसकी जड़ों में दो जग पानी डाला। अब गीता की उदासी दूर हो चुकी थी।

विशेष रक्षाबंधन

आज रक्षाबंधन था, लेकिन रीता तो अस्पताल में भर्ती थी। पिछले हफ्ते खांसी-बुखार के बाद टेस्ट करायाा तो वह कोरोना पॉजिटिव निकली| उसके साथ मम्मी, पापा, और भैया की भी जांच हुई। गनीमत है बाकी लोगों की रिपोर्ट नेगेटिव थी। रीता आज उदास थी कि वह प्यारे भैया की कलाई पर राखी नहीं बांध पाएगी। हर साल उसे रक्षाबंधन के त्योहार का बेसब्री से इंतज़ार रहता था। वह कई दिन पहले ही राखी बाज़ार से ले आती थी। रक्षाबंधन वाले दिन वह सुबह जल्दी तैयार हो जाती। भैया को तिलक लगाती फिर राखी बांधकर मिठाई खिलाती थी। आज जो फ्रॉक उसने पहनी थी, उसे पिछले साल भैया ने ही गिफ्ट में दिया था। फ्रॉक देख उसकी आंखों में आंसू भर आए। पिछले साल जब मम्मी-पापा ने पूछा था कि फ्रॉक के लिए पैसे कहां से आये तो भैया ने बताया था कि दो माह से उसने अपना जेब खर्च बचाया। यह सुनकर सभी भावुक हो गए थे।

मम्मी ने तो भैया को चूम लिया और ढेर सारा आशीर्वाद दिया।

लेकिन, आज रीता को चारों ओर मरीजों की चारपाइयां ही दिख रहीं थीं। अभी वह यह सब सोच ही रही थी कि डॉक्टर साहब राउंड पर आ गए। जैसे ही वह रीता की चारपाई के पास आए, तो उसकी आंखों में आंसू की बूंदे देखकर बोले, ‘रीता क्यों रो रही है? तू तो बहुत बहादुर बिटिया है। तू तो यहां अन्य मरीजों को कविताएं सुनाकर हंसाती है… फिर आज तू ही रो रही है…?’ रोते-रोते रीता ने अपने मन की व्यथा कह डाली। डाॅक्टर साहब के चेहरे पर भी उदासी छाने लगी। फिर भी वह बोले, ‘रीता, आज रक्षाबंधन के दिन मैं भी ड्यूटी पर हूं और अपना कर्तव्य निभा रहा हूं। मेरी भी एक बहन है, बिल्कुल तुम्हारे जैसी! लेकिन आज सुबह ही उसने मोबाइल पर मुझे बात करके कहा कि मैं उसकी चिंता छोड़कर केवल अपने मरीजों की चिंता करूं।’ कुछ पल रुककर उन्होंने फिर कहा, ‘रीता, तुम बिल्कुल भी चिंता न करो। मैं तुम्हारी उदासी दूर करने का प्रयास करता हूं।’ यह कहकर वह अन्य मरीजों को देखने के लिए आगे बढ़ गए।

कुछ देर के बाद डाॅक्टर साहब फिर आए। उनके साथ एक कर्मचारी भी था जिसके हाथ में कुछ राखियां थीं। डाॅक्टर साहब ने रीता की तरफ हाथ बढ़ाया और बोले, ‘लो, अपने इस नये भैया के हाथ में राखी बांधकर अपनी उदासी दूर करो।’ उनकी बात सुन रीता खिलखिलाकर हंस पड़ी। कर्मचारी के हाथ से राखी लेकर, उसने डाॅक्टर भैया की सेफ्टी ड्रेस के ऊपर से ही उनकी कलाई पर राखी बांध दी। फिर डॉक्टर साहब ने कहा, ‘अब अपनी बहना को गिफ्ट तो देना ही पड़ेगा और गिफ्ट के रूप में मैंने एक फ्राॅक तुम्हारे लिए मंगवाई है, लेकिन यह फ्राॅक तुम्हें तब मिलेगी, जब तुम्हारी यहां से छुट्टी होगी। फिर यह गिफ्ट लेकर अपने घर जाना| याद रखना घर जाने के बाद अपने इस नये भैया को भूलना मत।’ ‘नहीं भैया, मैं आपको और आज के इस विशेष रक्षाबंधन के दिन को कभी नहीं भूलूंगी।’ रीता ने मुस्कराते हुए कहा। एक बहन की उदासी दूर करने के इस उपाय की पूरे अस्पताल में चर्चा हो रही थी।

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