Monday, September 21, 2020
Home SECTIONS KAVITA जिंदगी को जीना चाहता हु

जिंदगी को जीना चाहता हु

जिंदगी को जीना चाहता हु …
आज फिर आसमान को चुना चाहता हु..
धरती और आस्मां की डोरी को अपने दिल
की गहराई से मापना चाहता हु ..
हा फिर से जिंदगी को जीना चाहता हु…
दिन बीत गए शाम बीत गयी घरो मे
बैठे बैठे रात बीत गयी फिर सवेरा आया
है जिंदगी को जीने का नया सलीखा आया है
काली घटाओ के बाद सुनेहरा सावन आया है
रिम झिम रिम झिम मान को चुने वाला बारिशो
का मौसम आया है आज फिर हवाओ में अपने गलियारों की मीठी की खूश्बू आयी है.
इसी खूश्बू , हवाओ और बारिश की तरह जिंदगी जीना चाहता हु ..
आज फिर आसमानों को चुना चाहता हु…
जिंदगी की भीड़ मे सब कुछ खो गया
बचपन खो गया जवानी खो गयी इस जिंदगी की भीड़ मे अपनी पहचान खो गयी क्या करू इन्ही शब्दो मे मेरी पहचान रह गयी …
इन्ही शब्दों को जिंदगी का स्तम्भ बनाऊगा जाते जाते जिंदगी को एक पहचान देना चाहता हु …
हा फिर जिंदगी को जीना चाहता हु…
फिर से आसमानो को छूना चाहता हु….
धन्यवाद,
धर्मेंद्र कुमार

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