Tuesday, September 22, 2020
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दैहिक दैविक भौतिक तापा…

आज पूरा संसार जिस त्रासदी से ग्रस्त है, उसके कारणों पर अगर बाकी चर्चाओं को दरकिनार कर दें तो एक महत्वपूर्ण और सर्वमान्य कारण है मानवीय चूक। ऐसी चूक जिसने शांति छीनी है, जिसमें एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ है। धर्म विमुख होते कई लोग अधर्म की राह पर चल पड़े हैं। धर्म है एक-दूसरे की तकलीफ समझना, धर्म है आपस में प्रेम से रहना। महान कवि तुलसीदास ने ऐसी ही व्यवस्था की तो कामना की थी। उन्होंने लिखा-
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।
अर्थात‍् ‘रामराज्य’ में किसी को दैहिक, दैविक और भौतिक तकलीफ नहीं है। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। असल में कवि या लेखक भी तो समाज को सजग करने वाले प्रमुख लोगों में होते हैं। ‘अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति:।’ अर्थात‍् इस अपार काव्य संसार के कवि भी विश्व के सृष्टा ब्रह्मा के समान रचयिता हैं। कवि के रूप में तुलसीदास ने सपनों का कुछ ऐसा ही संसार रचा जिसका महत्व पिछले चार सौ सालों से निरंतर बना हुआ है। यह स्वप्नलोक है रामराज का, जिसकी छाया पाकर मानव समाज आनंदित होता है। सुख का अनुभव करता है।
तुलसी का यह स्वप्नलोक लोकजीवन से परे नहीं, बल्कि अपने युग की इच्छा और आकांक्षाओं के अनुकूल है। ऐसे दौर में जब एक तरफ समाज में राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अव्यवस्था थी। चारों तरफ अधिकार लिप्सा, विषय-वासना के प्रति आसक्ति, शोषण की कुवृत्ति, विविध स्तरों पर मानसिक क्षुद्रता विद्यमान थी। ऐसी स्थिति से विक्षुब्ध होकर एक कवि के रूप में उन्होंने ऐसा विकल्प पेश किया जिससे समाज और संस्कृति में आशा का संचार हो सके। उन्होंने रामराज्य के माध्यम से सुख, शांति और सुव्यवस्था का अहसास कराया। ‘नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहि कोउ अबुध न लच्छन हीना।’ यहां कोई दुखी, दीन या दरिद्र नहीं है। सभी स्वस्थ, सुन्दर और रोगरहित हैं। इस उपलब्धि का कारण भौतिक समृद्धि नहीं, आध्यात्मिक विकास है, जिसका विस्तार तीनों लोकों में है। तुलसी के शब्दों में-
‘रामराज बैठे त्रय लोका। हरषित भये गये सब लोका।।
बयरू न कर काछू सज कोई। रामप्रताप विषमता खोई।।’
आज युग और परिस्थितियां भले ही भिन्न हैं, लेकिन वास्तविक धरातल पर विषमता, दुख व विषाद व्याप्त है। इस दैहिक दुख के कारण मनुष्य के बुरे कर्म हैं। मानसिक और शारीरिक रोग इसी के परिणाम होते हैं। दैविक दुखों का कारण सीधे-सीधे दिखाई नहीं देता। वे प्रकृति या अज्ञात शक्तियों के कारण होते हैं। बाढ़, भूकंप और महामारी आदि से उत्पन्न दुख को इसी श्रेणी में गिना जाता है। इसका कारण कहीं न कहीं मानव समाज ही है।
कठोर दंड नहीं, आध्यात्मिक उन्नति का दर्शन
तुलसीदास दुखी लोक के बरअक्स दूसरा आदर्शलोक, जिसे स्वप्नलोक भी कहा गया है, स्थापित करते हैं। इसमें मानव जीवन की उन्नति ही उन्नति है। यहां आपस में मारकाट नहीं, परस्पर प्रेम भाव है। सामाजिक विषमता नहीं, क्योंकि ‘राम प्रताप विषमता खोई’ है। रामराज में यह सब कठोर दंड विधान से संभव नहीं हुआ, बल्कि भौतिक सुख-सुविधा के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक शक्तियों के इस्तेमाल से हुआ है। तुलसी के रामराज में भौतिक के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति भी है। आत्मसुख की जगह समाज सुख की भावना व्याप्त है। सर्वकल्याण की भावना से युक्त समाज और संस्कृति की स्थापना ही तुलसीदास को आदर और श्रद्धायोग्य बनाती है। बदले हुए समय और समाज में उनके स्वप्नलोक पर ग्रहण लग गया है, लेकिन उसमें मानव कल्याण की जो भावना छिपी है, उसका महत्व बरकरार है। रामराज के बहाने जिस सुख की कल्पना की थी, उसकी चाहत आज भी बनी हुई है।

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