Sunday, September 20, 2020
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ज़िद है सिर्फ समाज को नहीं बल्कि समाज की सोच को भी बदलना है…

दिल्ली: वह पथ क्या पथिक कुशलता क्या जिस पथ पर बिखरे शूल ना हो, नाविक की धैर्य परीक्षा क्या यदि धाराएं प्रतिकूल ना हो। कुछ ऐसा ही जज़्बा अपने अंदर समेटकर दुनिया और समाज की मानसिकता को बदलने का प्रयास कर रही हैं संगिनी सहेली की संस्थापक प्रियल भारद्वाज।संगिनी सहेली एक ऐसी पहल जो आज के समय में महिलाओं की कमजोरी समझे जाने वाली दिनचर्या को जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बनाने का मादा रखती है, जिसे लोग आपस में फुसफुसा तो सकते हैं लेकिन सामने खुलकर बोल नहीं पाते। फुसफुसाहट और खुलकर बोलने की इस दुरी को ही खत्म करने का प्रयास कर रही हैं प्रियल भारद्वाज। ऐसा कौन है जो ये नहीं जानता कि महिलाओं में होने वाली महावारी को आज के समय में भी उनकी एक कमजोरी के रूप में देखा जाता है। प्राचीन काल से ही महिलाओं ने महावारी को लेकर इतना कुछ सहा है जिसकी कल्पना मात्र भी कर पाना आँखों में आंसू लाने को मजबूर कर देता है। लेकिन आज जब देश कि महिलाएँ, पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सभी क्षेत्र में आगे बढ़ रही है, तो सिर्फ इस एक वजह से क्यों उन्हें गृहणा भरी नज़रों से आँका जाता है? इस सवाल के पीछे छुपी लोगों की मानसिकता को बदलने का नाम है संगिनी सहेली संस्था जिसे पूरा करने में तन, मन और धन से जुटी हुई हैं प्रियल भारद्वाज। प्रियल भारद्वाज का मानना है कि इस विषय को लेकर लोगों को जागरूक करना बेहद जरुरी है, उन्हें ये बताना कि महिलाओं में होने वाली महावारी कोई अभिशाप नहीं बल्कि एक प्राकृतिक देन है जो प्रत्येक महिला के जीवनकाल का एक हिस्सा है। ऐसे विषय को लेकर सभी को जागरूक करना बेहद जरुरी है। साथ ही साथ प्रियल भारद्वाज इस बात पर भी ज़ोर देती है कि महावारी के समय महिलाओं को किस प्रकार अपने शरीर का ध्यान रखना चाहिए। यदि इस दौरान खुद का ध्यान नहीं रखा गया तो कैंसर जैसी कई घातक बीमारियों का भी सामना करना पड़ सकता है। ज्यादातर महिलाएं रक्तस्राव होने पर कपड़े का इस्तेमाल करती है, जिसकी वजह से इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है और जाने अनजाने इस प्रकार महिलाओं और बच्चियों में रोग उत्पन होने लगते हैं। और इस वजह से संगिनी सहेली संस्था का प्रयास रहता है कि महिलाओं और बच्चियों को साफ़ सुथरे पैड्स मुहैया करवाए जाएं। क्योंकि आज भी देश के अधिकाँश कोने ऐसे हैं जहां पैड्स का इस्तेमाल ही नहीं होता। या तो जागरूकता की कमी के चलते या फिर आर्थिक तंगी के कारण महिलाओं को पैड्स लेने में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। और उन सभी महिलाओं की परेशानी को समझते हुए संगिनी सहेली निशुल्क रूप से महिलाओं और बच्चियों को पैड्स प्रदान करती है। कोरोना काल में जब सारा देश अपने घरों में बंद था, तब इस सोच के साथ प्रियल भारद्वाज ने अपना सफर शुरू किया। मजदूर जब एक शहर से दूसरे शहर पलायन कर रहे थे, तब बाकी संस्थाएं उन्हें खाना, दवाइयां देने में जुटी हुई थी लेकिन महिलाओं की इस दिक्कत को कोई समझ नहीं पा रहा था। मन में विश्वास और एक नई उमंग के साथ प्रियल भारद्वाज ने अपने दोस्तों के साथ इस मुहिम की शुरुआत की ओर देखते ही देखते बस कुछ ही कम समय में संगिनी सहेली का कारवां कुछ इस कदर आगे बढ़ा कि लोग अपने आप जुड़ते चले गए। देश की राजधानी दिल्ली से शुरू होकर आज संगिनी सहेली देश के 17 राज्य और 54 शहरों में जागरूकता के इस अनूठे अभियान की मशाल जला चुकी है। पेशे से फैशन डिजाइनर प्रियल भारद्वाज ने अपने काम को विराम दिया और संगिनी सहेली की बागडोर संभाली। शुरुआत से लेकर अबतक संगिनी सहेली संस्था देश की 11 हजार 857 महिलाओं को निशुल्क सैनिटरी पैड्स बांट चुकी है और कई जगह तो उन्होंने गृहणियों के लिए सैनिटरी पैड्स बनाने की मशीन लगवाकर उनके लिए रोजगार भी उत्पन किया है। इसी कड़ी में आज दक्षिणी दिल्ली के आंबेडकर नगर में संगिनी सहेली ने कैंप लगाकर महिलाओं और बच्चियों को महावारी के बारे में जागरूक किया और सैनिटरी पैड्स का वितरण भी किया। इस मौके पर खुद संगिनी सहेली की संस्थापक प्रियल भारद्वाज, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की जॉइंट कमिश्नर अमन प्रीत, ओलंपिक्स में देश का नाम रोशन करने वाली जूडो खिलाडी गरिमा चौधरी और दक्षिणी दिल्ली पुलिस के अफसर आदि मौजूद रहें। इन सभी ने महिलाओं और बच्चियों को समाज से लड़ने के लिए जागरूक किया और महावारी को कमजोरी ना समझने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद कैंप में मौजूद महिलाएं और बच्चियों के आत्मविश्वास में इजाफा देखा गया। सभी ने संगिनी सहेली संस्था से जुड़ने का संकल्प लिया और भविष्य में मासिक धर्म के दौरान सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल करने का प्रण लिया। कैंप में मौजूद छोटी बच्चियों ने खुशी से प्रियल भारद्वाज को गले से लगा लिया। जिसपर प्रियल भारद्वाज का कहना था कि जब बच्चियों ने उन्हें गले लगाया तब उन्हें उनके संघर्ष का सफल परिणाम और अद्भुद खुशी का एहसास हुआ और शायद यही वो एहसास है जो उनके अंदर इस प्रकार आगे आकर समाज सेवा का बीड़ा उठाने की ललक को जन्म देता है। प्रियल भारद्वाज का कहना है कि संगिनी सहेली किसी एक की नहीं राष्ट्र की सभी महिलाओं की सहेली है और इस पहल को वो देश के हर एक कोने में पहुंचा कर रहेगी।

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