Sunday, September 20, 2020
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देवताओं के दिन की शुरुआत

शहरों में हमारा जीवन कुछ ऐसे ढर्रे पर चल पड़ा है कि जिंदगी की लय प्रकृति के साथ सुर ताल में नहीं है। जीवन का सूरज के साथ क्या रिश्ता है। पंखुड़ियों का नर्तन और पक्षियों के कलरव का संगीत लेकर प्रकृति सूरज का कैसे स्वागत करती है। कैसे उसकी किरणों के पांव पड़ते ही जीवन में ऊष्मा, मिठास और सुवास चारों ओर फैल जाती है, हम उसके साक्षी नहीं बनते, न ही जीवन के इस उत्सव में हम साझीदार होते हैं। सूरज और मिठास के साथ हमारे अंतरंग आत्मीय रिश्ते का परिचय कोई सबसे ज्यादा कराता है, तो वह है मकर संक्रांति। यह पर्व शीत से ठिठुरी जिंदगी की सारी गांठें खोलता है। शरीर की भी और मन की भी। देवता व उत्सव दोनों एक साथ जागते हैं। हिंदू धर्म के पर्व त्योहारों की खास बात यह है कि यह आस्था, विज्ञान, अध्यात्म सभी को साथ लेकर चलते हैं। इन सब सूत्रों को कथाओं, परंपरा और नृत्य संगीत के माध्यम से बड़ी खूबसूरती के साथ जीवन में पिरोते-गूंथते हैं। मकर संक्रांति जीवन और उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाता है। यह सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण होने का अवसर होता है, जब देवता जागते हैं। दिन रात के मुकाबले लंबे होने लगते हैं, किसान रबी फसलों के घर आ जाने के बाद आगे की जीवन की तैयारियों में जुटते हैं। राग रंग व उत्सव में सब भागीदार होते हैं। देवता, पितर, कुटुंब और गोधन सबको धर्म के अनुसार उनका हिस्सा मिलता है।
मकर संक्रांति को पूरे भारत में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। कहीं पोगल, कहीं भोगी, कहीं बीहू। हर जगह नए अनाजों का स्वागत अग्नि के चारों ओर नृत्य संगीत, बेटियों, कुटुंब के यहां सौगात भेजने की बात, थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ देखने को मिलती है। बचपन नदी के किनारे बीता है। तब जाड़े के दिनों सुबह-सुबह नदी की ओर देखने से ऐसा मालूम होता था, जैसे नदी से भाप निकल रही हो। और उसकी देखा-देखी हम बच्चों में गर्म सांसों को छोड़ कर मुंह से भाप निकालकर एक-दूसरे को दिखाने की होड़ लगती थी। इस दौरान हमारे बीच मकर संक्रांति को लेकर चर्चा रहती थी। हमारे लिए इसका नाम तिला संक्रांत था, जिसके आने की आहट के साथ गुड़ की सोंधी महक फैली होती थी। घरों में चूड़ा तिल और मूढ़ी की मिठाइयां बननी शुरू हो जाती थीं। हमें कहा जाता था कि तिला संक्रांत के दिन जो नदी में जितनी डुबकी लगाएगा, उसे उतनी लाई खाने को मिलेगी। ठंड के बावजूद हम सबमें सबसे पहले उठने और नदी में ज्यादा से ज्यादा डुबकी लगाने की होड़ रहती थी। रात में इस मौके पर बनने वाली खिचड़ी का भी काफी इंतजार होता था, जिसमें कई तरह की दालों के साथ-साथ कई तरह की ताजी सब्जियां डाली जाती थीं। नये अनाज और खेत की ताजी सब्जियों के स्वाद की बात निराली होती थी। न घी में कोई कंजूसी होती थी और न ही उसके चारों  यार- दही, पापड़ और अचार के साथ की।

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