Sunday, September 20, 2020
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ईश्वर का घर

पौराणिक गाथा के अनुसार त्रेतायुग में एक निःसंतान दंपति रत्नाकर और उनकी पत्नी भगवान विष्णु के बड़े भक्त थे। एक रात, भगवान ने सपने में रत्नाकर को दर्शन दिए और बताया कि जल्द ही उनके घर एक मेधावी कन्या का जन्म होगा। कालांतर में, बच्ची का जन्म हुआ और उसका नाम त्रिकुटा रखा गया। वर्षों बाद, त्रिकुटा तपस्या करने के लिए समुद्र के किनारे गईं। उसी दौरान भगवान राम वानर सेना के साथ वहां पहुंचे। श्रीराम ने त्रिकुटा से मुलाकात की और उन्हें बताया कि वह अपनी पत्नी सीता को रावण से छुडाने के लिए लंका जा रहे हैं। त्रिकुटा को वैष्णवी नाम देते हुए, श्रीराम ने उन्हें उत्तर दिशा में त्रिकुटा पर्वत पर जाने और कलियुग तक तप करने के लिए कहा। त्रिकुटा पर्वत पर, वैष्णवी एक गुफा में गयीं और देवी काली, लक्ष्मी और सरस्वती के संयुक्त रूप में एक शिला का रूप धारण करके ध्यान में लीन हो गयीं। इस स्थान पर जम्मू-कश्मीर के कटरा में माता वैष्णो देवी मंदिर है।
बाबा के लिए भवन
शिरड़ी में साईं बाबा जिस जगह रहे, उसे द्वारकामाई कहा जाने लगा। कई साल बीत गए। एक दिन, बूटी नाम का एक अमीर आदमी बाबा के पास आया। वह बाबा का भक्त था और उनके लिए इमारत बनाना चाहता था। उसने बाबा को अपनी इच्छा बताई, तो साईं ने कहा- मैं जाऊंगा और वहीं रहूंगा। बूटी यह सुनकर खुश हो गया कि बाबा उसके भवन में रहेंगे। लेकिन, इमारत बनने से पहले साईं बाबा बहुत बीमार पड़ गए। 15 अक्तूबर 1918 को उन्होंने अपनी भक्त लक्ष्मीबाई से कहा, ‘मैं जा रहा हूं। मुझे बूटी की इमारत में ले जाओ और वहां दफना दो।’ इस इमारत को महाराष्ट्र के शिरड़ी में समाधि मंदिर के नाम से जाना जाता है।
दानवी बनीं देवी
जब लाक्षागृह प्रकरण के बाद वारणावत से पांडव निकल रहे थे, तब उन्हें हिडिंब और हिडिम्बा नामक राक्षस भाई-बहन की जोड़ी मिली। हिडिंब पांडवों को मार कर खाने के लिए उनकी ओर दौड़ा। लेकिन, पांडव राजकुमार भीम सतर्क थे। भीम ने दानव के हर वार का सामना किया और उसका वध कर दिया। इसके बाद सभी पांडव वन से जाने लगे तो हिडिम्बा भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। यह देखकर भीम क्रोधित हो गये। तब युधिष्ठिर ने भीम को शांत किया। हिडिम्बा ने माता कुंती और युधिष्ठिर से कहा कि मैं भीम को पति मान चुकी हूं। हिडिम्बा की बात सुनकर युधिष्ठिर ने भीम को समझाया और उनका गंधर्व विवाह हुआ। बाद में, हिडिम्बा ने एक गुफा में लंबे समय तक ध्यान लगाया और देवी बन गयीं। मनाली में हिडिम्बा देवी मंदिर उसी स्थान पर है।

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