Wednesday, September 23, 2020
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मातृछाया

ऐ श्रुति! तेरे लाड़ले भैया आ रहे हैं।’ भाभी ने ऊपर वाली खिड़की से नीचे झांकते हुए कहा था।
‘कौन? कब?’
‘अरी, कुन्नू भैया! वही तो तेरे लाड़ले हैं न!
‘आपको कैसे पता?’
‘अभी फोन आया था। तेरे भैया से ही बात हुई है।’
भैया यों अचानक! वैसे पहले भी तो हमेशा ऐसा ही होता आया है। कब भैया अमेरिका से यहां पहुंच जाएं और कब यहां से वापस चल दें, कुछ पता नहीं। पिछली बार तो हद हो गयी थी। बिना किसी सूचना के आधी रात को टपक पड़े थे। मैं तो गहरी नींद में सपनों में गोते लगा रही थी जब मंगला भाभी ने आकर जगाया था, ‘अरी उठ तो! तेरे कुन्नू भैया आये हैं।’
पहले तो लगा कोई सपना देख रही हूं। लेकिन मंगला भाभी के बार-बार झिंझोड़ने पर उचक कर बैठ गयी थी। ज़रा अपने को संभालती हुई ड्राइंगरूम की ओर दौड़ी थी, ‘आप! इस वक्त!’ भैया से लिपटती बोली थी मैं।
‘क्यों, अच्छा नहीं लगा क्या?’
‘अरे, बहुत अच्छा लग रहा है! मुझे तो यकीन ही नहीं हो पा रहा।’
‘अभी नींद में हो न इसलिए। ज़रा आंखों पर पानी के छीटें मार कर आ।’
अब तक मंगला भाभी ने सभी को जगा दिया था। कुन्नू भैया सभी के चेहरों पर एक नज़र दौड़ाते बोले थे, ‘अम्मा नहीं जगीं क्या?’
उन्हें तो जान-बूझकर नहीं जगाया। रात ही बड़ी मुश्किल से सो पायीं। नींद के लिए डबल-डोज़ देनी पड़ी। भाभी ने कहा तो कुन्नु भैया एकाएक बोले, ‘तुम तो उन्हें दिन में भी गोली दे देती होंगी भाभी।’
कुन्नु भैया कह तो गए, जान मेरी निकल गई। भाभी इस बात को पचा पाएंगी भला। भैया का यों मुंहफट होना सभी को असमंजस में डाल देता है।
‘अच्छा अब तुम जा कर सो जाओ। मैं भी थका पड़ा हूं। सुबह उठ कर बातें करेंगे।’ भैया उठते हुए सीधे अम्मा के कमरे की ओर बढ़ गए।
‘अरे तू किधर जा रहा है।’ मंगला भाभी ने रोका ‘ऊपर छत वाले कमरे में आ जा। वहां ए.सी. भी लगा है।’
‘नहीं भाभी, पहले ही कोल्ड हुआ पड़ा है।’
इस वक्त अम्मा का कमरा किसी कबाड़खाने से कम न होगा। पिछले सात दिन से वहां झाड़ू भी लगा है कि नहीं, राम जाने। अर्चना भाभी कल ही तो नाक-भौं सिकोड़ कर कह रही थीं कि अम्मा के कमरे में घुसते ही दम घुटने लगता है।
कुन्नु भैया इस बात के लिए मुझे भी दोषी ठहरा सकते हैं। अब उन्हें कैसे बयान करूं कि सुबह पांच बजे उठ कर, तैयार होने के बाद सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना तैयार कर कैसे स्कूल के लिए भागना पड़ता है। स्कूल भी तो कोई पास नहीं। दो बसें बदल गांव की उस दो मीटर लम्बी पगडंडी पार करना भी अब मेरी ज़िन्दगी का ऐसा अध्याय बन गया है, जिसे मुझे रोज़ दोहराना पड़ता है। पिछले महीने भैया ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा दिया था, ‘महंगाई बहुत बढ़ गई है श्रुति! बिजली का बिल पहले से दूना आने लगा है। अम्मा की दवाइयों का खर्चा तीन गुना हो गया है। क्या ज़िंदगी भर तुम्हारी यह तीन हज़ार की कान्ट्रीब्यूशन ही रहेगी?’
स्कूल वाले कुल पांच हज़ार ही तो देते हैं। तीन हज़ार भैया को देने के बाद मेरे पास कितना बचा रहता है, मैं ही जानती हूं। रातभर रुपये-पैसे के आंकड़ों में उलझी रही थी। लेकिन जीवन में कितनी ऐसी समस्याएं होती हैं, जिनका हल खुद-ब-खुद निकल आता है। अगले दिन स्कूल पहुंचते ही प्रिंसिपल साहिबा बोली थीं, ‘मिस अंजना, अगर स्कूल के बाद थोड़ा समय निकाल पाओ तो दसवीं क्लास के बच्चों का ग्रुप ले लीजिएगा। बच्चे मैथ में बहुत वीक हैं। आपका भी ढाई-तीन हजार रुपया और बन जायेगा।’
सुबह बेड-टी लेकर अम्मा के कमरे में पहुंची तो बहुत प्यारा दृश्य देखने को मिला था। कुन्नु भैया अम्मा के गले में बांहें डाले सो रहा थे। मेरे दरवाज़ा खोलते ही कुन्नु भैया की नींद उखड़ गयी।
‘तू चाय लेकर आई है, तेरी दोनों भाभियां कहां हैं?’
‘आज संडे है भैया। संडे को दिन में सूरज नहीं चांद निकलता है। मैं आ गयी हूं न।’ भैया गुसल से निपट चाय सिड़ुकने लगे। अम्मा बार-बार उनकी बलइयां ले रही थीं– ‘तू पहले से इतना कमज़ोर क्यों हो गया है।’
‘मेरे हिस्से का तुम जो खा लेती हो अम्मा। तभी इतनी तंदुरुस्त होये रही।’
‘मेरी तो उम्र हो रही।’
‘अब जाने की तैयारी में है क्या?’
‘अब तो कर ही लूंगी। तुझे देखना था, देख लिया।’
मुझे याद है, एक बार अम्मा ने कहा था, हमें कभी भी मुंह से बुरे शब्द नहीं निकालने चाहिए।
‘क्यों अम्मा?’ मैंने सवाल रख दिया तो अम्मा कांपती आवाज़ में बोली थी, ‘हम जो कहते हैं, वह इसी ब्रह्माण्ड में घूमता–घामता हमीं पर आ बरपता है।’
अम्मा का कहा इतनी ज्ल्दी बरप जाएगा, सोचा भी नहीं जा सकता था। रात खाना खा कर अम्मा जल्दी ही बिस्तर पर पड़ गयीं। मेरी आंखें तो बंद होने का इंतजार कर ही रही थीं। लेकिन दो पल बाद ही कुन्नु भैया मेरे कमरे का दरवाज़ा खोल भीतर चले आये थे।
‘ज़रा बत्ती तो जला री!’ भैया की आवाज़ जैसे किसी ताबूत के भीतर से निकली थी। मैंने झट से उठ बत्ती जलाई– ‘क्या बात हो गई भैया?’
‘क्या अम्मा मेरे आने का इंतजार कर रही थीं?’
‘क्या मतलब?’
‘अम्मा नहीं रहीं।’ कुन्नु भैया मेरे से लिपट फूट पड़े थे। फिर तो पूरे घर भर में कोहराम मच गया।
जाने कैसे कुन्नू भैया ने तेरह दिन काटे थे। क्रिया के अगले ही दिन अपना सामान बांधते बोले– ‘मैं जा रहा हूं।’
कोई कुछ नहीं बोला। मैंने ही दो-चार मिनट उन्हें अकेला पा कह डाला– ‘आपका टिकट तो अभी एक महीना और है न?’
‘टिकट का क्या है, और बन जाएगा।’
कुन्नु भैया लौट गए थे। एक बरस होने को आ रहा है। इस बीच तीन-चार बार फोन आया था उनका। मैं जल्दी आऊंगा श्रुति। मुझे याद है, अम्मा ने एक जिम्मेवारी मुझ पर डाली थी। तेरे लिए दूल्हा ढूंढ़ना है मेरे को। बता तो तुझे कैसा दूल्हा चाहिए?
भैया कह रहे होते और आंसू मेरी आंखों से झर–झर बहने लगते। भैया कहीं ताड़ न जाएं, यह सोच अपनी सांसों को भी रोके रखती मैं। लेकिन भैया को तो जैसे सब नज़र ही आ रहा होता। झट से लहज़ा बदल लेते– ‘अच्छा बता तो तेरे लिए वो दो लम्बे-लम्बे कानों वाला और एक पूंछ वाला दूल्हा कैसा रहेगा? …अरे वही… जिसका एक प्यारा-सा नाम होता है… और उसे बुलाने में कितना मज़ा आया करेगा… गधा कहीं का!’
मेरे रूदन के बीच ही मेरी हंसी फूट पड़ती और मैं चिल्ला पड़ती– ‘भैऽऽया!’
किताब के पन्ने पलटती हुई इन्हीं ख्यालों में खोयी हुई थी कि मंगला भाभी ने भीतर कदम रखा– ‘श्रुति, तेरे भैया ऊपर बुला रहे हैं।’
भाई बिना लाग लपेट के बोले थे– ‘कुन्नु को रहने के लिए कौन-सा कमरा दें?’
यह बात मुझसे क्यों पूछी जा रही है, समझ नहीं पायी थी। भाई से नज़रें चुराती बोली– ‘जो आप ठीक समझें।’
अगर हमीं ने निर्णय लेना होता तो तुम्हीं से क्यों पूछते।
अब भला मैं क्या कहूं। मैं चुप बनी रही तो वे ही बोले– ‘अगर तुम अम्मा वाले कमरे में शिफ्ट कर लो तो…।’
‘जी मैं कर लूंगी।’
‘मुझे पता है तुम कुछ नहीं कर पाओगी।’ वे तेज़ी से मेरा सारा सामान अम्मा के कमरे में पटकने लगे। आंसू मेरे कोरों पर थे। बड़ी मुश्किल से मैंने उन्हें वहीं रोके रखा। उनके जाते ही मेरी रुलाई फूट पड़ी।
कुन्नू भैया आते ही बोले थे– ‘तू तो बहुत स्वार्थी है री! खुद अम्मा वाला कमरा हड़प कर के बैठ गई और मुझे दूसरे कमरे में सोने को कह रही है। तू उधर जा मैं तो अम्मा वाले कमरे में सोऊंगा।’
आज इतवार था। सुबह-सवेरे मुझे देखते ही भैया हंस पड़े– ‘आज फिर दिन में चांद निकला होगा न?’ मैंने अपनी छूटती हंसी को दबा-सा लिया। भैया सीढ़ियों की ओर बढ़ते हुए बोले– ‘चाय लेकर ऊपर आ जा। सबसे ऊपर वाली छत पर बैठते हैं।’
‘आप चलिए, मैं चाय लेकर आ रही हूं।’
ट्रे में दो कप चाय और बेकरी के आटे वाले बिस्किट लेकर मैं ऊपर पहुंची तो भैया झट से बिस्किट्स की प्लेट की ओर लपके थे– ‘घर पर बनवाये हैं क्या?’
‘नहीं तो।’
अम्मां का पीपा तो हमेशा इन्हीं से भरा रहता था। भैया एकाएक भावुक हो आये– ‘श्रुति, जब लाहौर छोड़ा था न, खाने को कुछ भी पास न था। चलते–चलते पड़ोस वाले खान बहादुर ने इन्हीं आटे वाले बिस्किुटों का आधा पीपा हमारी गाड़ी में रखवा दिया था। पूरे सात दिन अम्मां ने सभी बच्चों को यही बिस्किट खिलाये थे। अतुल और विनोद का तो भूख के मारे बुरा हाल होता था। एक बार दोनों को भूख से बिलखते देख मैं अम्मा से चोरी-छिपे पीपे में से बिस्किट निकालने लगा तो अम्मा ने मुझे पकड़ लिया था। खूब पिटाई हुई थी उस रोज़ मेरी।’
‘बाऊजी कहां थे उस वक्त?’
‘बाऊजी तो गाड़ी में बैठने से पहले ही लहूलुहान हो गए थे। उन लोगों ने तलवारों से बाऊजी पर बेइंतहा वार किए थे।’ सुबह-सवेरे भैया यह कैसा विषय ले बैठे, इस बात का ख्याल उन्हें भी जैसे अब आया। झट से पहले वाले प्रसंग पर आते बोले– ‘पता है, वह बिस्किटों का डिब्बा कितने दिन चला?’
‘कितने दिन?’
‘सिर्फ पांच दिन।’
‘उसके बाद?’
‘दो दिन अम्मा हमें उस डिब्बे में पानी घोल–घोल कर पिलाती रहीं, यह कह कर कि यह बिस्किटों का जूस है। सच श्रुति, बहुत खुशबू होती थी उसमें। और वह पीने के बाद नींद भी आ जाती थी।’
एकाएक भैया बोले– ‘तू जानती है मैं यहां क्यों आया हूं? अतुल और विनोद का फोन आया था। वे दोनों इस घर को बेचना चाहते हैं।’
‘क्या!’ ऐसा लगा, जैसे बिजली का करंट छू गया हो मेरे को।
‘तुझे बुरा लगा न? लेकिन वे शायद अपनी जगह पर ठीक हैं। विनोद तो अब बाहर रहता है। उसका वापस आने का कोई इरादा नहीं है। फिर अपना हिस्सा तो वह चाहेगा ही। अतुल भी अब स्वतंत्र होकर जीना चाहता है।’
‘भैया क्या आप भी…?’ कह तो गई लेकिन बाद में सोचा, जब तीनों भाई निर्णय ले बैठे हैं तो फिर भला मेरी कौन सुनेगा।
दोपहर को मंगला भाभी ने बताया था, शाम को तीनों भाइयों की मीटिंग होनी है। कुन्नू भैया ने छत के खुले हिस्से पर कुर्सियां लगा दी थीं। विनोद भैया ने आते ही शावर बाथ लिया और छत पर चढ़ गए। अतुल भैया ने मुझे और भाभी को भी छत पर बुला लिया था। बीयर की बोतल खोलते हुए कुन्नू भैया बोले– ‘तुम क्या सोचते हो इस मकान की ज्यादा से ज्यादा क्या कीमत होनी चाहिए?’
अतुल और विनोद भैया एक-दूसरे के चेहरे की ओर देखने लगे। फिर जैसे आंखों ही आंखों में कोई निर्णय लेते बोले– ‘कम से कम पचास लाख तो होनी ही चाहिए।’
‘और अधिक से अधिक?’
‘साठ लाख!’ विनोद भैया पूरे जोश के साथ बोले। ‘इससे ऊपर नहीं हो सकती।… पैंतालीस और साठ के बीच जहां तय होता है डील कर दीजिए।’
‘इस वक्त एक ग्राहक है मेरे पास। वह साठ लाख देने को तैयार है।’
कुन्नु भैया ने कहा तो अतुल, विनोद और भाभी के चेहरे पूरी तरह से खिल गए।
‘आपके पास ग्राहक है तो फिर सोचने वाली कोई बात ही नहीं। हमें यह डील मंजूर है।’
‘अगर आप और सोचना चाहें तो सोच सकते हैं। या फिर किसी से पूछना चाहें तो…?’
‘कैसी बात करते हो देवर जी! आपने ग्राहक ढूंढ़ा है तो कुछ सोच-समझ कर ही ढूंढ़ा होगा। हमारी तरफ से यह डील फाइनल रही।’
कुन्नु भैया ने तुरन्त पॉकेट में से दो चेक निकाले और दोनों भाइयों की ओर बढ़ा दिये– ‘ये लो तुम दोनों, बीस–बीस लाख रुपये। इस घर को मैं खरीद रहा हूं।’
‘तुम!’ सब के होंठ जैसे सिले के सिले रह गए।
‘क्या आप लोगों को कोई एतराज़ है?’
मंगला भाभी हड़बड़ाई सी बोली– ‘नहीं-नहीं! भला हमें क्यों कर एतराज़ होने लगा।’
मैं ही आश्चर्य से भर आई थी लेकिन मैं अपनी खुशी को समेट ही नहीं पा रही थी।
‘ठीक है हम जल्दी ही यहां से चले जाएंगे।’ अतुल भैया टॉयलट की ओर बढ़ते हुए बोले।
कुन्नु भैया ने अपलक एक बार सभी के चेहरों की ओर देखा फिर बीयर का एक लम्बा घूंट हलक से नीचे उतार गए।
किचन में आते ही भाभी बोलीं– ‘मैं जो भी सोचती हूं कभी गलत नहीं निकलता। लेकिन कुन्नु की इस चाल को नहीं पकड़ पायी मैं। हालांकि पिछली बार इसने कहा भी था कि इस मकान की जगह एक ‘बार–रेस्तरां’ खोल दिया जाए तो खूब चलेगा। बना ले बीस लाख से बीस करोड़।… हमारी किस्मत हमारे साथ है…। भूखे मरने वाले तो हम भी नहीं। चाहता तो भाइयों को भी साथ मिला सकता था। तू चिन्ता नहीं कर श्रुति, तेरा ब्याह हम करेंगे…।’ भाभी किचन के एक कोने से दूसरे कोने तक भाग रही थी। मैं समझ गई कि भाभी इस वक्त अपना सन्तुलन खो रही है। फाइनल डील भाभी ने ही तो की थी।
भैया तो सुबह मेरे उठने से तैयार होने के बीच घर से नदारद ही हो गए।
विनोद भैया बता रहे थे कि किसी आर्किटेक्ट से मिलने की बात कर रहा था और आज रात की फ्लाइट से लौट भी रहा है। कह रहा था, वहां कम्पनी वालों से कुछ इकट्ठा पैसा मिलना है। सब सार्ट–आउट करके जल्दी ही आ जाएगा। जरा रुक कर विनोद भैया बोले– ‘इसके लिए तो भारत से अमेरिका… पुरानी दिल्ली से नई दिल्ली जाना जैसा हो गया।’
शाम को स्कूल से लौटी तो भाभी ने ही बताया– ‘विनोद ठीक कह रहा था। सुबह जनाब इसी महीने मकान खाली करने को कह गए हैं।’
‘इसी महीने!’ मैं चौंकी थी– ‘इतनी जल्दी सब कैसे हो पाएगा भाभी।’
‘इसमें चिन्ता किस बात की। अब तो तेरे स्कूल के और पास जा रहे हैं हम।’
पूरा एक महीना बीतने वाला था। अम्मा की बरसी पास आ रही थी। भाभी रात ही अतुल भैया से कह रही थी– ‘पण्डित जी को वक्त पर बोल देना। अम्मा की बरसी अगर उसी घर में हो जाती तो कितना अच्छा होता। जानने वाले चार लोग तो आ जाते। अब इस नयी जगह पर भला अम्मा के लिए किसी को क्या दुख।’
एकाएक कुन्नु भैया जैसे साक्षात‍् सामने आ खड़े हुए। वे होते तो झट से कह देते– भाभी, सच–सच बोलो, क्या तुम अम्मा के चले जाने पर दुखी हो? फिर एक ठहाका गूंजना था और भाभी जवाब देने के लिए बगलें झांकने लगतीं। फोन की घंटी ने मुझे इन ख्यालों से बाहर खींचा। रिसीवर उठाया तो कुन्नु भैया की आवाज़ थी– ‘श्रुति, मैं जल्दी ही आ रहा हूं। अम्मा वाले घर को तुड़वा कर कुछ नया बनवाना चाहता हूं। मैं अतुल से बात करने वाला हूं। वह तुझे और भाभी को लेकर आ जायेगा। विनोद और अर्चना भी आयेंगे।’
‘हम ही बुरे क्यों बनें।’ भाभी बोलीं– ‘हम न गये तो दुनिया भर को सुनाता फिरेगा। थोड़ा-बहुत शगुन डालना पड़ेगा, वह मैं डाल दूंगी। उसने सुबह बुलाया है, अम्मा के लिए हवन हम शाम को रख लेते हैं।’
भाभी कहें और अतुल भैया न मानें। कार दौड़ रही थी। लगभग पैंतालीस मिनट में हम पुराने घर पर थे। इस बार हमने जो देखा, भाभी के लिये तो जैसे सदमा लगने वाली बात थी। घर के मुख्य द्वार पर एक बड़ा-सा बैनर लगा था, जिस पर लिखा था– कृष्णा मन्दिर।
कुन्नु भैया बाहर ही खड़े थे। हमें देखते ही आगे बढ़ आये– ‘भाभी, पण्डित जी एक घण्टे तक आ जाएंगे। पहले अम्मा के लिए हवन पाठ होगा, उसके बाद अम्मा के नाम के मंदिर की ईंट रखी जायेगी। आप श्रुति को साथ लेकर मोहल्ले में भी कह आइयेगा।’
भैया कह रहे थे और मैं मूक उनके चेहरे की ओर देखने लगी। एक निस्तेज आभा मुझे कुन्नु भैया के चेहरे पर फैलती नज़र आयी।
सहसा भैया की आंखें मेरी आंखों से जा मिलीं और वे बोले– ‘अभी एक जिम्मेवारी और भी है मुझ पर। मन्दिर के शुरू होते ही हम उसे भी पूरा कर डालेंगे।’
कुन्नु भैया ने मुझे अपनी बांहों के घेरे में ले लिया था– ‘श्रुति, मां के बाद भले ही हम कितना दूर चले जाएं, इस घर पर जो मातृछाया थी, वह हमेशा बनी रहेगी। हम कभी भी निःसंकोच यहां पर आकर मिल सकते हैं।’
कहीं सिर से पांव तक पिघल आयी थी मैं। क्या अतुल भैया ओर विनोद भैया न पिघले होंगे।

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