Saturday, September 26, 2020
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धर्म हेतु साका जिनि किया…

अमृतसर में माता नानकी की कोख से पैदा हुए श्री गुरु तेग बहादुर जी का बचपन का नाम त्यागमल था, जिन्होंने धर्म और आदर्शों की रक्षा करते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी। मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में वीरता का परिचय दिया था। उनकी इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने ही उनका नाम ‘तेग बहादुर’ (तलवार का धनी) रखा था। सिखों के 8वें गुरु हरिकृष्ण जी की अकाल मृत्यु हो जाने के बाद तेग बहादुर जी को नौवां गुरु बनाया गया, जिनके जीवन का प्रथम दर्शन ही यही था कि धर्म का मार्ग सत्य और विजय का मार्ग है।
श्री गुरु तेग बहादुर जी ने न केवल धर्म की रक्षा की, बल्कि देश में धार्मिक आजादी का मार्ग भी प्रशस्त किया। उन्होंने हिन्दुओं और कश्मीरी पंडितों की मदद कर, धर्म की रक्षा करते हुए बलिदान दिया। मुगल शासक औरंगजेब ने उन्हें हिन्दुओं की मदद करने और इस्लाम नहीं अपनाने के कारण मौत की सजा सुनाई थी और उनका सिर कलम करा दिया था। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति देने वालों में गुरु तेग बहादुर का स्थान अद्वितीय है और एक धर्म रक्षक के रूप में उनके महान बलिदानों को समूचा विश्व कदापि नहीं भूल सकता।
औरंगजेब के अत्याचारों से त्रस्त कश्मीर के कुछ पंडित मदद की आशा और विश्वास के साथ गुरु तेग बहादुर के पास पहुंचे और उन्हें अपने ऊपर हो रहे जुल्मों की पूरी दास्तान सुनायी।
उनकी पीड़ा सुनकर गुरु तेग बहादुर जी ने कहा यह भय शासन का है, उसकी ताकत का है पर इस बाहरी भय से कहीं अधिक भय हमारे मन का है। हमारी आत्मिक शक्ति दुर्बल हो गई है, हमारा आत्मबल नष्ट हो गया है और इस बल को प्राप्त किए बिना यह समाज भयमुक्त नहीं होगा तथा बिना भयमुक्त हुए यह समाज अन्याय और अत्याचार का सामना नहीं कर सकेगा। उन्होंने कहा कि सदा हमारे साथ रहने वाला परमात्मा ही हमें वह शक्ति देगा कि हम निर्भय होकर अन्याय का सामना कर सकें। एक जीवन की आहुति अनेक लोगों के जीवन को इस रास्ते पर लाएगी। लोगों को ज्यादा समझ नहीं आया तो उन्होंने पूछा कि उन्हें इन परिस्थितियों में क्या करना चाहिए? तब गुरु तेग बहादुर ने मुस्कराते हुए कहा कि तुम लोग बादशाह से जाकर कहो कि यदि तेग बहादुर मुसलमान हो जाए तो हम सभी इस्लाम स्वीकार कर लेंगे।
आखिरकार धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी और उनके तीनों परम प्रिय शिष्यों- भाई मतिदास, दयालदास और सतीदास ने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहूति दे दी। हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हुए गुरु तेग बहादुर को उसके बाद से ही ‘हिंद की चादर, गुरु तेग बहादुर’ के नाम से भी जाना जाता है। शांति, क्षमा और सहनशीलता के विलक्षण गुणों वाले गुरु तेग बहादुर ने उनका अहित करने की कोशिश करने वालों को सदा अपने इन्हीं गुणों से परास्त किया और लोगों को सदैव प्रेम, एकता और भाईचारे का संदेश दिया।

अपने पिता गुरु तेग बहादुर के बलिदान पर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने लिखा-

तिलक जंझू राखा प्रभु ता का।
कीनो बडो कलू महि साका।।
साधनि हेति इति जिनि करी।
सीसु दिया पर सी न उचरी।।
धर्म हेतु साका जिनि किया।
सीसु दिया पर सिररु न दिया।।

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