Sunday, September 27, 2020
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संगमेश्वर महादेव शिव और शक्ति का अनूठा संगम

पिहोवा (पृथूदक) का संगमेश्वर महादेव अरुणाय एक विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल है। सरस्वती और दृष्दवती (घघ्घर) के मध्य स्थित क्षेत्र ‘ब्रह्मावर्त’ के रूप में विख्यात रहा है, जिसका प्रमुख तीर्थ कुरुक्षेत्र है। महाराजा वेन के पुत्र महाराजा पृथु द्वारा अपने पिता की अन्त्येष्टि जिस स्थल पर संपन्न की गयी, वह स्थान पृथूदक (पृथु का सरोवर) नाम से प्रख्यात हुआ। इसकी महिमा कुरुक्षेत्र से भी अधिक बताई गयी है।
पुण्यमाहु: कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात‍् सरस्वतीम‍्।
सरसवत्याइच तीर्थानि तीर्थेभ्यइच पृथूदकम‍्।।
यहां महादेव के दर्शन से पाप-मुक्ति की बात भी कही जाती है। ऋषि वसिष्ठ-विश्वामित्र विवाद प्रसंग में जब सरस्वती में रक्त-प्रवाह होने लगा तो भगवान महादेव की कृपा से सरस्वती अपने पूर्व रूप को प्राप्त कर पायी। ‘वामन पुराण’ में उल्लेख है कि भगवान शिव ने परिवार सहित यहां पधार कर सरस्वती में स्नान किया था। यहां पर गणपति की अग्रपूजा का निर्णय हुआ था।
पृथूदक (पिहोवा) के पृथ्वीश्वर महादेव मंदिर एवं पशुपतिनाथ महादेव की विशेष महिमा है। नेपाल स्थित इसी नाम के मंदिर से इस धर्मस्थल का महत्व कम नहीं। पृथूदक से पांच किलोमीटर दूर (अम्बाला की ओर मुख्य सड़क से हट कर) अरुणा संगम तीर्थ है। इस तीर्थ के महत्व का उल्लेख वामन, स्कन्द, पद‍्म, ब्रह्म, वैवर्त पुराणों और महाभारत में है। इस तीर्थ की चर्चा सरस्वती संगम, सोम तीर्थ, प्रभास तीर्थ, मधुस्रव नामों से भी हुई है। वामन पुराण में महर्षि लोमहर्ष का कथन है कि अरुणा संगम तीर्थ पर तीन रात उपवास-स्नान करने वाला व्यक्ति पाप-मुक्त हो जाता है।
वर्तमान संगमेश्वर महादेव अरुणाय तीर्थ का गौरवपूर्ण इतिहास है। एक समय यहां एक डेरा था, जिसमें साधु गणेश गिरि अपने दो शिष्यों के साथ निवास करते थे। वे जीवन निर्वाह हेतु गोपालन तथा खेती पर निर्भर थे। मान्यता है कि एक बार इन महात्मा को ऐसा अहसास हुआ कि समीप ही किसी शक्ति का निवास है। खोज करने पर उन्हें झाड़ियों के मध्य एक बांबी का ढेर दिखाई दिया। स्थान पर खुदाई की गयी तो पत्थर की सुन्दर पिंडी के दर्शन हुए। पिंडी को स्थान से उखाड़ने के अनेक प्रयास असफल रहे। महात्मा जी को स्वप्न में भगवान शंकर ने इस स्थल के उद्धार-संस्कार का आदेश दिया। प्रात: इस स्थल पर जाने पर महात्मा जी को पिंडी पर आरूढ़ मणिमय सर्प के दर्शन हुए। यहां पर एक छोटा-सा शिव मंदिर निर्मित हुआ। कालांतर में इस स्थल की व्यवस्था पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के हाथ में आ गयी। इस संस्था के प्रयासों तथा शिव-भक्तों के आर्थिक सहयोग से इस तीर्थ की कायापलट अल्प समय में ही हो गयी। छोटा-सा शिव मंदिर भव्य रूप ले चुका है। धर्मस्थल के विकास में महन्त गिरधर नारायणपुरी, बाबा शरणपुरी तथा महन्त गंगापुरी की भूमिका रही है।
महन्त वंशीपुरी ने इसी स्थल पर कई वर्ष तक कठोर साधना की थी। उनके अनुसार पहले यहां चतुर्थी को भक्तजन बहुत बड़ी संख्या में एकत्रित होते थे। अब त्रयोदशी एवं चतुर्थी को लोगों की भीड़ ने मेले का रूप ले लिया है। केवल हरियाणा से ही नहीं अन्य प्रांतों एवं विदेश के लोग भी इस वार्षिक समागम में बहुत बड़ी संख्या में उपस्थित होकर शिव-शक्ति की आराधना करते हैं। जहां शिव हो वहां शक्ति का भी निवास रहता है। शक्ति स्थलों की खोज कर महन्त बंशीपुरी जी ने अपने अनुयायियों एवं सहकर्मियों के सहयोग से मां बगलामुखी धामों की स्थापना की है। मान्यता है कि शिव-शक्ति की पूजा-आराधना से जीवन के चारों पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की सिद्धि होती है। त्रयोदशी पर्व संगमेश्वर इसी का पर्याय है।

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