Thursday, October 1, 2020
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कहन लागे मोहन मैया-मैया…

सूरदास भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और प्रेम के अनन्य गायक हैं। अपने साहित्य में कृष्ण की बाल और प्रेम लीला का वर्णन जिस समर्पण और तन्मयता से किया है वह उनकी विलक्षण प्रतिभा का परिचायक है। अपनी उर्वर कल्पना शक्ति, वाक‍् चातुर्य और प्रतिभा के बलबूते उन्होंने कृष्ण के बाल्य और प्रेमी रूप का अति सुंदर, सरस, सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है। ऐसे समय में जब बच्चों का बालपन धीरे-धीरे वर्चुअल दुनिया की गिरफ्त में आ गया है या फिर पढ़ाई-लिखाई के बोझ तले दब-सा गया है। माता-पिता के पास आज न तो बच्चों की दुनिया में झांकने का पूरा समय है और न ही उनकी देखभाल करने का पूरा इंतजाम। ऐसे दौर में सूरदास का बाल लीला वर्णन सहजता और मनोहर रूप में बरबस ही आकर्षित करता है। सूर सागर में उन्होंने बालक कृष्ण की सैकड़ों छवियों का विशद् और ब्योरेवार वर्णन किया है। कृष्ण की जीवन लीला की पहली अवस्था बाल्यावस्था है। इस बालपन में उनका पहला रूप घुटने पर चलने और पालने में झूलने का आता है। मां यशोदा एक आम भारतीय मां की तरह उन्हें किस तरह झुलाती हैं, उसका वर्णन और चित्रण देखा जा सकता है- ‘यशोदा हरि पालने झुलावै। हलरावै दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै। मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहे न आनि सुहावै।’
इसी तरह वह बालक कृष्ण की उस अवस्था की भी एक झांकी पेश करते हैं जब वह सिर्फ घुटनों के बल चलते हैं। ऐसे रूप में उनकी एक और छवि का चित्रण- ‘सोभित करनव नीत लिए। घुटुरुनि चलन रेनु तन मंडित मुख दधि लेपकिए।’ घुटनों के बाद वह अपने पैरों पर भी चलना सीखते हैं। वह तुतलाते हुए अपने माता-पिता को भी पुकारने लगे हैं, नटखट रूप भी अख्तियार कर लिया है, ‘कहन लागे मोहन मैया-मैया। नंद महर सों बाबा-बाबा अरु हलधर सों भैया।’
बच्चों की दुनिया यहीं तक सीमित नहीं रहती। वह धीरे-धीरे अपनी दूसरी छवि लेकर आगे भी बढ़ते हैं। इस कड़ी में कभी बालक कृष्ण का रूप-सौन्दर्य सामने आता है तो कभी क्रीड़ा और चेष्टाओं का वर्णन आता है। बच्चों में जिज्ञासा, प्रतिस्पर्धा, खीझ, उलाहना और ईर्ष्या जैसे कई भाव बरबस आते हैं। कृष्ण शरारत करके भी भोले बने रहने की तरकीब अपनाते हैं, ‘मैया माेरी मैं नहिं माखन खायो।’ जबकि यह सर्वविदित हो गया है कि कृष्ण माखन चुराकर खाने लगे हैं। ‘चली ब्रज घर घरनि यह बात। नंदसुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात।’ लेकिन इसे वह अपने भोलेपन से छिपाने की कोशिश करते हैं। इसी तरह उनमें जिज्ञासा के भाव का भी चित्र खींचा है। जैसे- ‘मैया कबहुं बढैगी चोटी।’ या फिर ‘मैया मोहिं दाउ बहुत खिझायो।’
मन की इस तरह की अवस्थाओं से गुजरने के बाद विभिन्न संस्कारों और उत्सवों में उनकी जो छवि उभरती है उसका चित्रण भी सूरदास करते हैं। बाल वर्णन के बहाने बीच-बीच में अालौकिक रूप का भी दर्शन कराते हैं जो सिर्फ लोकरंजन के लिए इस जगत में आया है। बाल जीवन के बारे में जितनी तरह की कल्पनाएं की जा सकती हैं उन सबका विशद् और बारीक से बारीक चित्रण उन्होंने किया है।
मां-बाप की नजर में बच्चे किस तरह बड़े होते हैं इसका स्वाभाविक चित्रण भी वह बीच-बीच में करते हैं, ‘सुत मुख देखि यशोदा फूली। हर्षित देखी दूध की दतियां प्रेम मगन तन की सुधि भूली।’
सूरदास द्वारा बालक कृष्ण के वात्सल्य और शृंगारी रूप का चित्रण आरोप-प्रत्यारोपों से परे है। साहित्यिक प्रतिभा के इस धनी कवि का जन्म संवत 1540 के निकट और मृत्य संवत 1620 के आस-पास मानी जाती है। इनके गुरु बल्लभाचार्य थे। चौरासी वैष्णव की वार्ता के आधार पर उनका जन्म रूनकता अथवा रेणुका क्षेत्र है जो आज के समय में आगरा जिले के अंतर्गत आता है। बल्लभाचार्य से इनकी भेंट वहीं पर हुई और कृष्णभक्त के रूप में उनके जीवन को नया रूप मिला।
बाल वर्णन का अनूठा चित्रण
ऐसी हरेक गतिविधि जो मां-बाप और पास पड़ोस को लुभाए उसका चित्रण सूरदास सहज ढंग से करते हैं। इसी कारण उन्हें आलोचकों ने बाल वर्णन का सम्राट कहा है। सूरदास बाल वर्णन उस रूप में करते हैं कि इसके बहाने पूरी ब्रज संस्कृति और सभ्यता सामने आ जाती है। संस्कृति और सभ्यता का यह रूप भारतीयता की पहचान है। आज जब हम पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के घटाटोप में घिरते हैं तो सूरदास के उन पदों को याद करते हैं जो भारतीय संस्कृति में रची-बसी हैं। करीब पांच सौ साल पहले रचित सूरसागर में कृष्ण की लीलाएं और पद मंदिरों, पूजा स्थलों और विभिन्न उत्सवों में आज भी गाए गुनगुनाए जा रहे हैं।
… और शृंगार की वह रसधारा
भगवान कृष्ण बाल जीवन से लेकर युवावस्था में पहुंचते हैं। यहां एक प्रेमी कृष्ण के रूप में वह लोक जीवन में उपस्थित होते हैं। राधा-कृष्ण का प्रेम हो या फिर गोप-गोपियों का, इसमें भी सूरदास का मन खूब रमा है। वह दोनों के मिलन पक्ष के भी अनेक चित्र खीचते हैं। प्रेम का यह रूप जिसमें सामाजिक बंधन नहीं है, ऊंच-नीच का भेद नहीं है। छोटे-बड़े, काले-गोरे, गरीब-अमीर और जाति संरचना से परे प्रेम का रूप अपनी सहजता में लोगों को बरबस आकर्षित करता है।

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