Monday, September 21, 2020
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जीवन के रण में राह दिखाती गीता

कुरुक्षेत्र की रणभूमि में हजारों वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा विषादग्रस्त अर्जुन को दिया गया गीता का अमर संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जब जीवन का रणक्षेत्र भौतिक चकाचौंध के बीच जटिल हो चुका है। व्यक्ति जीवन की भागदौड़ में इस कदर मशगूल है कि वह इसके बीच जीवन के सही मायने खो बैठा है। वह किधर जा रहा है, उसे सुध नहीं है। जब खुमारी उतरती है तो खुद को ठगा महसूस करता है। गहन अवसाद-विषाद के इन पलों में विचार उठता है कि आखिर मैं हूं कौन? इस क्षणभंगुर, नश्वर जीवन का मकसद क्या है? इस चंचल मन की शांति-स्थिरता कैसे सुनिश्चित हो? जीवन में सच्चे सुख-आनंद का राजमार्ग क्या है? परिस्थितियों के इस जटिल चक्रव्यूह के बीच जीवन का प्रकाशपूर्ण मार्ग क्या है?
गीता आंतरिक संक्रांति के ऐसे विषम पलों में मार्गदर्शन करती है, अंधेरे में प्रकाश स्तम्भ की भांति जीवन का राजमार्ग सुझाती है और संजीवनी बनकर बुझे प्राणों में नई चेतना का संचार करती है। गीता का संदेश सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है। आश्चर्य नहीं कि हर युग में जिज्ञासुओं, प्रबुद्धजनों एवं विचारकों ने गीता ज्ञान की मुक्तकंठ से प्रशंसा की, चाहे वे भारत के रहे हों, या सात समंदर पार विदेश के। जिसने भी इसका परायण किया, उसको गीता के आश्वासन देते स्वरों ने अपने आगोश में लिया और संतप्त हृदय को दिव्य प्रकाश से आलोकित किया।
भगवान श्रीकृष्ण शरण में आए भक्त के योग-क्षेम वहन का वादा करते हैं (योगक्षेमं वहाम्यहम, गीता-9.22)। और साथ ही जीवन से थके-हारे व्यक्ति को आशा भरा संदेश देते हैं। गीता के अनुसार, ईश्वरोन्मुख पापी व्यक्ति के भी उद्धार का मार्ग खुल जाता है। शीघ्र ही उसका जीवन सुधर-संवर जाता है। (अपि चेत्सुदुराचारो भजते… साधुरेव स मन्तव्यः, गीता-9.30) लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए न्यूनतम पात्रता का भी विधान है, जिसका गीता में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह व्यावहारिक अध्यात्म का वह स्वरूप है, जिसको व्यक्ति दैनिक जीवन में चिंतन, मनन एवं अभ्यास करते हुए अपना सकता है। इसके मुख्य सोपानों को इन बिंदुओं के तहत समझा जा सकता है-

  • आत्मचेतना में जागरण– गीता का शुभारम्भ ही जैसे आत्मज्ञान के पावन छींटों के साथ होता है, जो मूढ़ावस्था में पड़े अर्जुन को मोहनिद्रा से जगाते हैं। आत्मा के अजर-अमर-अविनाशी स्वरूप (अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे, गीता-2.20) का हल्का-सा भी बोध जीवन की अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल देता है। ऐसे में जीवन के संघर्ष बौने लगते हैं। चुनौतियां जीवन में प्रगति के अवसर तथा उत्कर्ष का साधन बन जाती हैं। अपने आध्यात्मिक स्वरूप एवं इसकी अनन्त संभावनाओं पर विश्वास निश्चित रूप में आत्मचेतना की अंगड़ाई है, जो व्यक्ति को जीवन की उच्चतर कक्षाओं के लिए तैयार करती है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बार-बार इस आत्मतत्व का बोध करने व ईश्वरीय चेतना के अंश के रूप में उसकी विराट सत्ता से जुड़ने पर बल देते हैं।
  • स्वधर्म का बोध एवं कर्तव्य निष्ठा– आत्म-बोध के साथ स्वधर्म का बोध गीता की एक महत्वपूर्ण शिक्षा है, जिसे एक कर्मयोगी जीवन का शुभारम्भ कह सकते हैं। स्वधर्म के साथ जीवन एक सृजन पर्व बन जाता है तथा कर्तव्य निष्ठा जीवन का अभिन्न अंग। अपने कर्तव्य कर्म के प्रति एकाग्रता जीवन की सफलता एवं शांति को सुनिश्चित करती है।
  • अतिवाद नहीं– गीता जीवन में मध्यममार्ग का प्रतिपादन करती है और अतिवाद से बचने की हिमायत देती है। भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों में, यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिल्कुल न खाने वाले का, न बहुत सोने वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है। दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने व जागने वाले का ही सिद्ध होता है। (युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु..,गीता-6.17) अतिवादी के लिए योग, अध्यात्म और मन की शांति दुष्कर बतायी गयी है।
  • मन का अनुशासन– स्वयं को अवसाद से उबारने व अपने पैर पर आप खड़ा होने का भाव गीता की एक प्रबल शिक्षा है। ईश्वरीय सहारे के बावजूद अपने पुरुषार्थ द्वारा अपने उद्धार के संकल्प (उद्धरेदात्मनात्मानं…गीता-6.5) पर गीता बल देती है। इस प्रक्रिया में मन की चंचल प्रकृति (चंचलं हि मनः कृष्ण, ,गीता-6.34) को समझाती है। गीता के अनुसार सधा हुआ मन सबसे बड़ा मित्र है तो अनियंत्रित मन सबसे बड़ा शत्रु (बन्धुरात्मात्मनस्तस्य…अनात्मनस्तु शत्रुत्वे,गीता-6.6)। चंचल मन को साधने के लिए अभ्यास योग का सुझाव देती है (अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते,गीता-6.35)। इस प्रक्रिया में ध्यानयोग का प्रतिपादन करती है। बुद्धि-विवेक के जागरण पर बल देती है। गीता के अनुसार ज्ञान से पवित्र कोई वस्तु नहीं(न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमहि, गीता-4.38)।
  • सुमिरन, अर्पण, यज्ञकर्म– गीता का कर्म विवेकयुक्त एवं अर्पण भाव से किया गया श्रेष्ठ कर्म है, जिसे यज्ञ कर्म कहा गया है और इसे इहलोक एवं परलोक को सिद्ध करने वाला बताया गया है (गीता-4.31)। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सतत भगवद्सुमरण एवं अर्पण करते हुए हर कर्म को करने की बात करते हैं। श्रीकृष्ण ने कहा, नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुषों का मैं स्वयं योगक्षेम वहन करता हूं (गीता-9.22)। जीवन के द्वंद्वों के बीच समभाव में रहकर कार्य करने को समत्व योग (समत्वं योग उच्यते, गीता-2.48) की संज्ञा दी है। इसी मनःस्थिति में किया गया श्रेष्ठ कर्म योग बन जाता है।
    यह विवेक एवं भक्ति से पूर्ण कर्म गीता का व्यावहारिक अध्यात्म है, जो व्यक्ति को अपने कर्तव्य कर्म का पालन करते हुए, सत्य के पक्ष में धर्मयुद्ध के लिए खड़ा करता है। चित्त शुद्धि के साथ व्यक्ति के आंतरिक उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इस तरह व्यक्ति जहां खड़ा है, वहीं से एक कर्मयोगी की भांति अपने कर्तव्य को पूरा करते हुए आंतरिक शांति-स्थिरता के साथ बाहरी उत्कृष्टता को प्राप्त करता है और एक सफल-सार्थक जीवन का प्रयोजन सिद्ध करता है।
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