Friday, April 23, 2021
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27 जून विशेष : वैज्ञानिकों ने दावा किया था की धूम्रपान से होता है फेफड़ों का कैंसर

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) के अनुसार तम्बाकू का सेवन करने वाले हर 10 में से 9 व्यक्ति को इसकी लत 18 साल से कम उम्र में लग जाती है। इसके सेवन से हर साल 80 लाख लोगों की मौत होती है। कोविड-19 (Covid-19) के संक्रमण से मुक्त होने की क्षमता भी कम होती है। एक आकलन के अनुसार विश्व में करीब 15 वर्ष की उम्र के चार करोड़ बच्चे तंबाकू का नशा करते हैं। इससे कैंसर (Cancer), हृदय संबंधी रोग (Heart Disease), श्वसन रोग (Respiratory Related Disease), शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाना और गर्भवती मलिाओं में गर्भपात का खतरा भी बढ़ता है। तम्बाकू खाने से फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है।

63 साल पहले किया था दावा
दरअसल, 27 जून, 1957 को प्रकाशित हुई ब्रिटेन की मेडिकल रिसर्च काउंसिल की एक खास रिपोर्ट में पहली बार यह बताया गया कि धूम्रपान, फेफड़ों के कैंसर का सीधा कारण है। इन नतीजों पर पहुंचने से पहले शोधकर्ताओं ने बीते पच्चीस सालों में फेफड़ों के कैंसर से मरने वालों की बढ़ती संख्या का कारण ढूंढने की कोशिश की थी। इतने आंकड़ों का विश्लेषण करके पाया गया कि इनमें से बड़ी संख्या में प्रभावित लोग धूम्रपान करते थे। उस समय शोधकर्ताओं के इस दावे को सिगरेट और तंबाकू के दूसरे उत्पाद बनाने वाली कई कंपनियों ने सिरे से नकार दिया था। कईयों का कहना था कि यह सिर्फ ‘नजरिए का मामला’ है। रिपोर्ट में पाया गया कि 1945 में फेफड़ों के कैंसर से मरने वालों की मृत्यु दर 10 लाख लोगों में केवल 188 थी। दस साल के बाद यही मृत्यु दर करीब दोगुनी हो कर 388 तक पहुंच गई थी। इन नतीजों तक पहुंचने के लिए उस समय छह देशों में किए गए कई अनुसंधानों से तथ्य जमा किए गए थे। इन सबमें सिगरेट पीने वालों की संख्या और बढ़ती हुई मृत्यु दर में सीधा संबंध दिखाई दिया।

तम्बाकू उत्पादों को घर व ऑफिस से हटा लें। कैंडी, च्यूइंगम, सौंफ या चॉकलेट पास रखें ताकि तलब होने पर खा सकें। प्रतिदिन दिनचर्या से तम्बाकू से जुड़ी आदतों को कम करते जाएं। फेफड़ों के कैंसर से आज हर साल हजारों जानें जाती हैं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को इस बात के कई सबूत मिल चुके हैं जो धूम्रपान से इसके गहरे संबंधों को स्थापित करता है। इसके अलावा तंबाकू के सेवन से कई तरह की दिल की बीमारियों और स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2020 के आखिर तक दुनिया भर में इससे मरने वालों की संख्या करीब एक करोड़ तक पहुंच जाएगी।

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