Tuesday, September 22, 2020
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पांडवों के अज्ञातवास का साक्षी पचोवन

भगवान श्री कृष्ण की जन्मस्थली बृज मंडल क्षेत्र से लगते हरियाणा के जिला पलवल में स्थित ऐतिहासिक पांडवकालीन पचोवन मंदिर की बड़ी महिमा है। इसे पंचवटी धाम भी कहा जाता है। इस धार्मिक स्थल के प्रति पलवल ही नहीं बल्कि समूचे हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब व उत्तर प्रदेश सहित अनेक स्थानों के लोगों की आस्था है। मंगलवार और शनिवार को तो यहां मेले जैसा माहौल रहता है। सावन में प्रतिदिन यहां बड़ी संख्या में लोग शिवलिंग का अभिषेक करते हैं।
किंवदंतियों के अनुसार इस मंदिर का संबंध महाभारत-काल से जुड़ा हुआ है। जनश्रुति के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास का कुछ समय यहां बिताया था। यहां एक तालाब था, जो द्रोपदी घाट के नाम से प्रसिद्ध था। मान्यता है कि यहां बाबा तिरखा राम दास ने कड़ी तपस्या की थी। यहां मुख्य मंदिर हनुमान जी का है। माता और भगवान शिव के भी मंदिर हैं। मंदिर प्रांगण में सैकडों वर्ष पुराने पांच वट वृक्ष हैं। अब यहां खाटू श्याम का भी भव्य मंदिर बन चुका है, वहीं प्राचीन तालाब को आधुनिक सरोवर बनाने की योजना है।
मंदिर में विशाल गौशाला है। चिकित्सा शिविर, गरीबों के लिए भंडारे, धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। अतिथिगृह में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने का भी प्रबंध है। मंदिर के महंत महामंडलेश्वर कामता दास जी महाराज सामाजिक आयोजनों में शामिल होकर समाजसेवा के कार्यों में मदद करते रहते हैं। वहीं, जन्माष्टमी को विशाल दंगल लगता है और बाबा छबीले दास महाराज का वार्षिकोत्सव मनाया जाता है। इस दौरान अयोध्या, काशी, चित्रकूट, हरिद्वार, द्वारका, इलाहाबाद समेत विभिन्न स्थानों से हजारों की संख्या में साधु-संत पहुंचते हैं।
पलवल के विधायक दीपक मंगला का कहना है कि यहां धार्मिक व सामाजिक आयोजनों के अलावा साधु व गौसेवा को भी महत्व दिया जाता है। यहां गरीबों के लिए भंडारे लगते हैं। मंदिर में साफ-सफाई, बिजली-पानी का पूरा प्रबंध है।
ऐसे पहुंचें मंदिर : पलवल रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से तिपहिये व रिक्शा मंदिर के लिए मिल जाते हैं। अगर अपने वाहन से आ रहे हैं तो न्यू सोहना रोड से जिला नागरिक अस्पताल होते हुए महाराणा प्रताप भवन के साथ से मंदिर के मोड़ पर पहुंच सकते हैं, वहां से मंदिर कुछ ही दूरी पर है।
पर्यावरण बचाने का संदेश
यह मंदिर पूर्णरूप से पॉलीथीन मुक्त है। मंदिर में न तो पॉलीथीन में प्रसाद चढ़ाया जाता और न ही डिस्पोजेबज सामग्री का प्रयोग होता। मंदिर लोगों को दूषित हो रहे पर्यावरण को बचाने के लिए भी जागरूक कर रहा है।

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